
इस पुस्तक का उद्देश्य है, इस्लाम धर्म के बारे प्रचलित प्रश्नों के उत्तर के माध्मय से इस महान धर्म का लोगों से परिचय कराना; सदियों से विभिन्न सभ्यताओं तथा जातियों को समायोजित करने, घटनाओं के साथ जीते हुए आगे बढ़ने और विकास के साथ तालमेल रखने में उसकी विशिष्टता, अनुपमता और लचीलेपन को दर्शाना तथा उसकी मज़बूती, उसके चेहरे को बिगाड़ने के प्रयासों के बावजूद उसके बाक़ी एवं जारी रहने की क्षमता और उन नाकारात्मक प्रचारों के सामने डटे रहने की शक्ति को बयान करना, जो उसके विरुद्ध किए जाते हैं, जो उसे आतंकवाद से जोड़ते हैं और लोगों को उसके ख़िलाफ़ लड़ने पर उभारते हैं।
इंसान किसी पूज्य पर ईमान ज़रूर रखता है। चाहे वह ईमान किसी सच्चे माबूद पर रखे या किसी असत्य पूज्य पर। फिर वह उसे पूज्य कहे या कुछ और। उनका यह पूज्य कोई पेड़ भी हो सकता है। आकाश का कोई तारा, कोई औरत, ऑफ़िस का बाॅस या कोई वैज्ञानिक सिद्धांत भी हो सकता है। यह पूज्य उसकी आकांक्षा भी हो सकती है। इंसान का किसी न किसी चीज़ पर ईमान ज़रूरत होता है, जिसका वह अनुसरण करता है, जिसको पवित्र समझता है और जिसके निर्देश अनुसार जीवन बिताता है, बल्कि यदि उसके लिए जान देने की ज़रूरत पड़े तो जान भी दे देता है। हम इसी को इबादत कहते हैं। दरअसल सच्चे माबूद की इबादत इंसान को दूसरे लोगों या समाज की इबादत से मुक्ति प्रदान करती है।
सच्चा पूज्य वही है, जिसने इस ब्रह्मांड को पैदा किया है और असत्य पूज्यों की इबादत इस दावे पर आधारित है कि वे पू्जय हैं। जबकि पूज्य के लिए सृष्टिकर्ता होना अनिवार्य है। फिर उसके सृष्टिकर्ता होने को प्रमाणित इस प्रकार किया जा सकता है कि ब्रह्मांड में उसकी पैदा की हुई चीज़ों को देखा जा सके या पूज्य की ओर से कोई संदेश आए, जो साबित करे कि वह सृष्टिकर्ता है। लेकिन जब इस दावे का कोई प्रमाण न हो, न ब्रह्मांड में उनकी पैदा की हुई चीज़ें देखी जा सकती हों और न खुद उनकी वाणी से इस तरह की बात साबित हो पाती हो, तो निश्चित रूप से ये पूज्य असत्य होंगे।
हम देखते हैं कि इंसान मुस़ीबत के समय एक हस्ती की ओर लौटता है और उसी से उम्मीदें बाँधता हैं। वह एक से अधिक हस्तियों को नहीं पुकारता। विज्ञान ने भी ब्रह्मांड के परिदृश्य और इसकी घटनाओं की पहचान करके ब्रह्मांड में एकल पदार्थ और एकल व्यवस्था को साबित किया है। इसी प्रकार अस्तित्व में समानता और समरूपता के माध्यम से भी इस बात को साबित किया है।
फिर हम एक परिवार के स्तर पर कल्पना करें, जब माँ एवं बाप हमारे भविष्य को लेकर मतभेद करते हैं तो उसका अंजाम यह होता है कि बच्चे बर्बाद हो जाते हैं एवं उनका भविष्य नष्ट हो जाता है। तो फिर दो या दो से अधिक पूज्य यदि ब्रह्मांड का प्रबंध चलाएं तो क्या होगा?... More
मध्य पूर्व में ईसाई, यहूदी एवं मुसलमान शब्द "अल्लाह" का प्रयोग पूज्य को बताने के लिए करते हैं। इसका अर्थ होता है एक सत्य पूज्य, जो मूसा एवं ईसा का भी पूज्य है। सृष्टिकर्ता ने पवित्र क़ुरआन में "अल्लाह" एवं दूसरे नामों एवं गुणों से अपना परिचय कराया है। शब्द ''अल्लाह'' का उल्लेख ओल्ड टेस्टामेंट के पुराने संस्करण में 89 बार हुआ है।
क़ुरआन में महान अल्लाह के जिन गुणों का उल्लेख हुआ है, उनमें से एक गुण "ख़ालिक" (सृष्टिकर्ता) है :
''वही अल्लाह है, पैदा करने वाला, अस्तित्व प्रदान करने वाला, रूप देने वाला। उसी के लिए शुभ नाम हैं, उसकी पवित्रता का वर्णन करता है जो (भी) आकाशों तथा धरती में है और वह प्रभावशाली, ह़िक्मत वाला है।'' [2] [सूरा अल-हश्र : 24]... More
यह प्रश्न सृष्टिकर्ता के बारे में ग़लत धारणा एवं उसे सृष्टि के समरूप समझने के कारण पैदा हुआ है। यह धारणा तार्किक और दार्शनिक दोनों रूप से अस्वीकृत है। उदाहरण स्वरूप :
क्या कोई व्यक्ति एक साधारण प्रश्न का उत्तर दे सकता है कि लाल रंग की गंध क्या होती है? बेशक, इस सवाल का कोई जवाब नहीं है। क्योंकि लाल रंग को उन चीजों में वर्गीकृत नहीं किया जाता है जिन्हें सूंघा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, टीवी या रेफ़्रिजरेटर जैसी वस्तु या माल का निर्माता, उपकरण के उपयोग के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है और इन निर्देशों को एक पुस्तिका में लिखता है, जो बताती है कि उपकरण का उपयोग कैसे करें और उस पुस्तिका को उस डिवाइस के साथ रख देता है। यदि उपभोक्ता उस डिवाइस से वांछित लाभ उठाना चाहता है, तो उसे इन निर्देशों का पालन करना होता है, जबकि निर्माता स्वयं इन क़ानूनों के अधीन नहीं है।... More
सृष्टिकर्ता पर ईमान इस वास्तविकता पर आधारित है कि चीज़ें बिना कारण के प्रकट नहीं होतीं। आपको बस इतना बता देना काफ़ी है कि विशाल भौतिक ब्रह्मांड और उसमें रहने वाले जीव एक अमूर्त चेतना रखते हैं और सारहीन गणित के नियमों का पालन करते हैं। एक सीमित भौतिक ब्रह्मांड के अस्तित्व की व्याख्या करने के लिए भी हमें एक स्वतंत्र, सारहीन और शाश्वत स्रोत की आवश्यकता है।
आकस्मिकता स्वयं ब्रह्मांड का निर्माण नहीं कर सकती है, इसलिए कि वह मुख्य कारण नहीं है। बल्कि वह द्वितीयक परिणाम है, जो अन्य कारकों (युग, स्थान, पदार्थ एवं उर्जा) की उपलब्धता पर निर्भर करता है, ताकि इन कारकों से मिलकर कोई चीज़ अचानक अस्तित्व में आए। अतः संयोग (आकस्मिकता) शब्द का प्रयोग किसी चीज़ की व्याख्या के लिए नहीं किया जा सकता है, क्योंकि आकस्मिकता कोई भी वस्तु नहीं है।
उदाहरण स्वरूप, यदि कोई व्यक्ति अपने कमरे में प्रवेश करे और खिड़की का काँच टूटा हुआ पाकर अपने घर वालों से प्रश्न करे कि किसने खिड़की का काँच तोड़ा और वे उसको उत्तर दें कि अचनानक टूट गया है, तो यह उत्तर ग़लत होगा। इसलिए कि उसने यह नहीं पूछा था कि खिड़की का काँच कैसे टूटा, बल्कि उसने यह पूछा था कि तोड़ा किसने है? आकस्मिता क्रिया का विषेशण है, न कि कर्ता। सही उत्तर यह होगा कि वह कहें कि इसको अमुक ने तोड़ा है। फिर बयान करें कि उसने इसे जानबूझ कर तोड़ा है अचनानक टूट गया है। यह बात ब्रह्मांड और सृष्टियों पर पूरे तौर पर लागू होती है।... More
हम इंद्रधनुष और मरीचिका देखते हैं, जबकि इनका कोई वजूद नहीं होता। हम गुरुत्वाकर्षण को देखे बिना उसके अस्तित्व को सच मानते हैं, सिर्फ इसलिए कि यह भौतिक विज्ञान द्वारा सिद्ध किया गया है।
''उसे निगाहें नहीं पातीं और वह सब निगाहों को पाता है और वही अत्यंत सूक्ष्मदर्शी, सब ख़बर रखने वाला है।'' [22] केवल उदाहरण के तौर और बात को समझने के देखिए कि मनुष्य किसी ऐसी चीज का वर्णन नहीं कर सकता जो भौतिक नहीं हो, जैसे कि ''सोच''। किलो ग्राम में उसका वज़न, सेंटमीटर में उसकी लंबाई, उसकी रासायनिक संरचना, उसका रंग, उसका दबाव और उसकी शक्ल एवं सूरत आदि बयान नहीं की जा सकती।
[सूरा अल-अनआम: 103]... More
उदाहरण के तौर पर, हालाँकि अल्लाह के लिए उच्च उदाहरण है, परन्तु केवल बात समझाने लिए कहा जा सकता है कि जब इंसान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का प्रयोग करता है और उसे बाहर से निर्देशित करता है, तो वह उस इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के अंदर किसी भी हाल में प्रवेश नही करता।
अगर हम कहें कि अल्लाह तआला ऐसा कर सकता है, इसलिए कि वह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है, तो ऐसे में हमारे लिए यह मानना भी ज़रूरी होगा कि वह एकमात्र पूज्य एवं सृष्टिकर्ता, ऐसे कार्य नहीं करता, जो उसकी शान के अनुरूप न हों। वह इससे बहुत ऊँचा है।
उदाहरण के तौर पर, हालाँकि अल्लाह के लिए उच्च उदाहरण है : कोई भी पुजारी या उच्च धार्मिक पद का व्यक्ति नग्न होकर सार्वजनिक सड़क पर नहीं निकलता है, हालांकि वह ऐसा कर सकता है, लेकिन वह इस सूरत में जनता के सामने नहीं आ सकता, क्योंकि यह व्यवहार उसकी धार्मिक स्थिति के लिए उचित नहीं है।... More
जैसा कि प्रसिद्ध है कि मानव रचित संविधान में संप्रभुता के अधिकार या बादशाह के अधिकार से छेड़छाड़ करना दूसरे किसी भी अपराध से बढ़कर है। तो बादशाहों के बादशाह के अधिकार के बारे में आपका क्या ख़्याल है? अल्लाह का अपने बन्दों पर अधिकार है कि वे केवल उसी की इबादत करें, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''अल्लाह का अपने बन्दों पर यह अधिकार है कि वे उसी की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक (साझी) न करें। और क्या तुम जानते हो कि जब बन्दे ऐसा कर लें, तो अल्लाह पर बन्दों का क्या अधिकार है? (वर्णनकर्ता कहते हैं कि) मैंने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। आपने कहा : बन्दों का अल्लाह पर अधिकार यह है कि वह उनको यातना न दे।''
हमारे लिए बस इतना समझ लेना काफ़ी है कि हम किसी को कोई उपहार दें और वह किसी और का शुक्रिया अदा करे तथा किसी दूसरे की फ्रशंसा करे। हालाँकि अल्लाह के लिए उच्च उदाहरण है, लेकिन यही हाल बन्दों का उनके सृष्टिकर्ता के साथ है। अल्लाह ने उन्हें इतनी सारी नेमतों से नवाज़ा है कि उनकी कोई गिनती नहीं है और वे अल्लाह को छोड़ दूसरे का धन्यवाद करते हैं। हालाँकि सृष्टिकर्ता हर हाल में बेनियाज़ है और उसे बंदों की प्रशंसा तथा शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है।
अल्लाह तआला का पवित्र क़ुरआन की बहुत सारी आयतों में अपने लिए ''हम'' का शब्द प्रयोग करना यह बताता है कि वह एक है, जो सुन्दरता एवं पवित्रता के बहुत सारे गुणों को अपने अंदर समेटे हुए है। इसी प्रकार अरबी भाषा में यह शब्द शक्ति एवं महानता को दर्शाता है। अंग्रेजी भाषा में भी ''हम बादशाह'' कहा जाता है। इस तरह बहुवचन सर्वनाम का प्रयोग बादशाह, सुल्तान और देश के प्रमुख आदि ऐसे व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जो बहुत बड़े पद पर बैठे हों। अलबत्ता, क़ुरआन इबादत के मामले में हमेशा केवल एक अल्लाह की इबादत पर जोर देता है।
''आप कह दें कि यह तुम्हारे पालनहार की ओर से यह सत्य है ।जो चाहे ईमान लाए एवं जो चाहे इनकार कर दे।'' [28] [सूरा अल-कहफ़ : 29]
सृष्टिकर्ता के लिए यह संभव था कि वह हमें अपने आज्ञापालन एवं इबादत पर मजबूर कर देता, लेकिन मजबूर करने से इन्सान की रचना का अपेक्षित उद्देश्य पूरा नहीं होता।
अल्लाह की हिकमत आदम को पैदा करने और उसे ज्ञान प्रदान करने के माध्यम से प्रदर्शित हुई।... More
जब इन्सान अपने आपको बहुत अधिक मालदार एवं दानशील पाता है, तो वह अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों को खाने-पीने के लिए बुलाता है।
हमारे यह गुण दरअसल अल्लाह के गुणों का एक छोटा-सा हिस्सा हैं। अल्लाह सृष्टिकर्ता है, उसके सुन्दर एवं प्रताप वाले गुण हैं, वह बड़ा दयालु एवं कृपावान है, वह देने वाला एवं दानशील है। उसने हमें अपनी इबादत के लिए पैदा किया है, ताकि यदि हम निष्ठावान होकर उसकी इबादत करें, उसकी आज्ञा का पालन करें एवं उसके आदेश अनुसार चलें, तो हमपर रहम करे, हमें ख़ुशियाँ प्रदान करे और हमें बहुत कुछ दे। दरअसल इन्सान का हर अच्छा गुण, अल्लाह के गुणों से ही निकला हुआ है।
उसने हम सबको पैदा किया एवं हमें एख़्तियार दिया। अब हमपर है कि हम आज्ञापालन एवं इबादत का मार्ग चुनें या अल्लाह के अस्तित्व का इंकार करके बग़ावत एवं अवज्ञा का रास्ता चुन लें।... More
यदि अल्लाह सृष्टि को अस्तित्व में आने या न आने का एख़्तियार देता, तो इसके लिए ज़रूरी होता सृष्टि का वजूद पहले से रहा हो। क्योंकि बिना अस्तित्व के मानव की कोई राय ही कैसे हो सकती है? यहाँ सवाल अस्तित्व में होने या न होने का है। इंसान का जीवन के साथ जुड़ा होना एवं उसे खोने का डर उसका इस नेमत से राज़ी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
ज़िन्दगी की नेमत मानव के लिए एक परीक्षा है, ताकि अच्छे इनसान जो अपने रब से राज़ी हों एवं बुरे इंसान जो अपने रब से नाराज़ हों, दोनों के बीच अंतर किया जा सके। अतः मानव की रचना से अल्लाह का उद्देश्य है उससे राज़ी रहने वालों को अलग करना, ताकि उन्हें आख़िरत में अल्लाह का सम्मानीय घर प्राप्त हो।
यह सवाल दरअसल इस बात का प्रमाण है कि जब संदेह दिमाग़ों में घर कर जाए, तो सोच व विचार ख़त्म हो जाता है और यह क़ुरआन के चमत्कार होने का एक प्रमाण है।... More
धर्म जीवन व्यतीत करने का तरीक़ा है, जो इंसान के संबंध को उसके सृष्टिकर्ता के साथ एवं उसके आस-पास की चीज़ों के साथ सुनियोजित करता है। धर्म आख़िरत का रास्ता है।
धर्म की आवश्यकता खाने-पीने की आवश्यकता से भी अधिक है। इंसान स्वाभाविक रूप से धार्मिक है। यदि वह सत्य धर्म को नहीं पा सका, तो अपने लिए कोई न कोई धर्म गढ़ लेगा, जैसा कि मूर्तिपूजा पर आधारित धर्मों को लोगों ने गढ़ लिया। इंसान को जिस प्रकार इस दुनिया में शांति की आवश्यकता है, उसी प्रकार उसे मरने के बाद शांति की आवश्यकता है।
और सत्य धर्म ही अपने अनुयायियों को दोनों जहनों में पूर्ण शांति प्रदान करता है। उदाहरण स्वरूप :
यदि हम एक अनजान रास्ते पर चलें और हमारे सामने दो विकल्प हों। एक यह कि हम रास्ते में मौजूद बोर्डों के निर्देशों का पालन करें और दूसरा यह कि अंदाज़ा लगाने की कोशिश करें, जो हमारे खो जाने या हलाक हो जाने का कारण बन सकता है।... More
यह आवश्यक है कि सत्य धर्म इंसान की प्रथम फ़ितरत के अनुसार हो, जिसे बिना किसी मध्यस्थ के अपने सृष्टिकर्ता के साथ सीधे संबंध की आवश्यकता होती है और जो इंसान में सद्गुणों और अच्छे आचरणों का प्रतिनिधित्व करती है।
वह धर्म अनिवार्य रूप से एक हो, आसान हो, सरल हो, समझ में आने वाला हो, जटिल न हो तथा हर युग व स्थान के लिए उचित हो।
वह हर युग में इंसान की आवश्यकता के अनुसार, क़ानूनों में विविधता के साथ सभी नस्लों, देशों और हर प्रकार के इंसान के लिए स्थापित हो। वह मानव निर्मित रस्मों और रिवाजों की तरह न इच्छाओं के अनुसार की जाने वाली ज़्यादती को स्वीकार करे और न कमी को।... More
जब मानव जाति फ़ना हो जाएगी, जो केवल अल्लाह बाक़ी रह जाएगा, जो हमेशा जीवित रहेगा और जिसे मौत नहीं आनी है। जो व्यक्ति धर्म की छत्रछाया में आचरण के पालन के महत्व को नकारता है, वह उस व्यक्ति की तरह है, जो बारह वर्ष क्लास में पढ़े और अंत में कहे कि मुझे सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
''और हम उसकी ओर आएँगे जो उन्होंने कोई भी कर्म किया होगा, तो उसे बिखरी हुई धूल बना देंगे।'' [41] धर्म का उद्देश्य यह है कि इंसान से उसके रब का परिचय कराए। फिर इंसान को उसके अस्तित्व के स्रोत, उसके मार्ग एवं उसके अंजाम से अवगत कराए। अच्छा अंत एवं अच्छा ठिकाना सारे संसार के पालनहार की जानकारी हासिल करके, उसकी इबादत तथा उसकी रज़ामंदी के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है और यह रज़ामंदी अच्छे आचरण से धरती को आबाद करके प्राप्त हो सकती है। शर्त यह है कि बन्दे के काम अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए हों।
[अल- फ़ुरक़ान : 23] धरती को आबाद करना एवं अच्छे आचरण का पालन करना, दोनों धर्म का उद्देश्य नहीं हैं, लेकिन वास्तव में दोनों साधन हैं।... More
अक़्ल की भूमिका चीज़ों को आंकने और उनको प्रमाणित करने की है। अतः इंसान के अस्तित्व के उद्देश्य तक अक़्ल का पहुँच न पाना, उसकी भूमिका का ख़त्म हो जाना नहीं है, बल्कि धर्म को यह अवसर प्रदान करना है कि वह इन्सान को वह बात समझाए, जो अक़्ल समझ नहीं पाई। धर्म इंसान को उसके सृष्टिकर्ता के बारे, उसके अस्तित्व के स्रोत एवं उसके उद्देश्य के बारे में बताता है। तब अक़्ल इन बातों को समझने का प्रयास करती है, इनका मूल्यांकन करती है एवं इनकी पुष्टि करती है। इस तरह सृष्टिकर्ता के वजूद को मान लेने से विवेक तथा तर्क निष्क्रिय नहीं हुआ।
आज (ब्रह्मांड के एक निर्माता के अस्तित्व के) कई खंडनकर्ता मानते हैं कि प्रकाश को समय में सीमित नहीं किया जा सकता है। लेकिन वे इस बात को स्वीकार नहीं करते कि सृष्टिकर्ता समय और स्थान के नियम के अधीन नहीं है। अर्थात् सृष्टिकर्ता हर चीज़ से पहले और हर चीज़ के बाद है, वह उच्च है और कोई भी सृष्टि उसे अपने घेरे में नहीं ले सकती।
आज बहुत-से लोगों का मानना है कि जुड़े हुए अणु जब अलग होते हैं, तो एक-दूसरे के साथ संवाद भी करते रहते हैं, परन्तु इस विचार को स्वीकार नहीं करते कि सृष्टिकर्ता अपने ज्ञान के द्वारा अपने बन्दे के साथ होता है, बंदा जहाँ भी जाए। वे अक़्ल को देखे बिना उसपर विश्वास रखते हैं, परन्तु अल्लाह को देखे बिना उसपर विश्वास रखने से इंकार कर देते हैं।
बहुत-से लोग जन्नत एवं जहन्नम पर ईमान रखने से इंकार करते हैं और बहुत-सी दूसरी दुनियाओं को उन्हें देखे बिना मान लेते हैं। उन्हें भौतिक विज्ञान ने उन चीजों पर विश्वास करने के लिए कहा, जो अस्तित्व में भी नहीं हैं। उदाहरण स्वरूप मृचिका को ले लीचिए। उन्होंने उसे मान भी लिया और स्वीकार भी कर लिया। जबकि मृत्यु के समय, न तो भौतिकी से मनुष्यों को कोई लाभ होगा और न ही रसायन विज्ञान से। क्योंकि इन विज्ञानों ने उनसे अनस्तित्व का वादा किया है।... More
ब्रह्मांड के निर्माता के अस्तित्व में विश्वास एक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी है। विश्वास विवेक को सचेत करता है और मोमिन को अपने हर बड़े और छोटे काम के लिए खुद की समीक्षा करने पर उभारता है। मोमिन ज़िम्मेदार होता है अपने आपका, अपने परिवार का, अपने पड़ोसी का, यहाँ तक कि मुसाफिर का भी। वह साधनों को अपनाता है और अल्लाह पर भरोसा करता है। मैं नहीं समझता हूँ कि ये अफीम के नशेड़ियों की विशेषताएँ हैं। [43] अफीम एक मादक पदार्थ है, जिसे खसखस के पौधे से निकाला जाता है और हेरोइन बनाने के लिए उसका इस्तेमाल होता है।
लोगों के लिए वास्तविक अफीम आस्था नहीं, बल्कि नास्तिकता है। क्योंकि नास्तिकता अपने अनुयायियों को भौतिकवाद, सृष्टिकर्ता से अपने संबंध के बारे में न सोचने, धर्म का इंकार करने तथा जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का परित्याग करने की ओर बुलाती है। इसी प्रकार यह अंजाम से बेख़बर होकर केवल वर्तमान में जीने को कहती है। यानी लोगों का जो मन चाहे करें बिना इस विश्वास के कि उनपर कोई अल्लाह का रखवाला या उनके कामों का हिसाब रखने वाला निर्धारित है या उनको दोबारा जीवित होकर उठना है और हिसाब-किताब के मरहले से गुज़रना है। क्या वास्तव में यह नशेड़ियों की विशेषता नहीं है?
सही धर्म की परख तीन मुख्य बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है [44] : पुस्तक ''ख़ुराफ़तुल इल्हाद'' (नास्तिक्ता का मिथक) का उद्धरित। लेखक : डा० अम्र शरीफ़, प्रकाशन: 2014 ई०।
इस धर्म में सृष्टिकर्ता या पूज्य के गुण।
रसूल या नबी की विशेषताएँ।... More
एक चीज़ है, जिस फ़ितरत-ए-सलीमा या मंतिक़-ए-सलीम कहा जाता है। हर वह चीज़ जो फ़ितरत-ए-सलीमा और सही अक़्ल के अनुरूप हो, वह अल्लाह की तरफ से है, जबकि हर जटिल चीज़ मानव की तरफ़ से है।
मिसाल के तौर पर :
यदि हमें कोई इस्लाम, ईसाई, हिन्दू या किसी और धर्म का आदमी बताए कि इस ब्रह्मांड का एक ही सृष्टिकर्ता है, उसका कोई साझी नहीं है और न उसकी कोई संतान है, वह किसी इंसान, जानवर, पत्थर या मूर्ति की शक्ल में इस दुनिया में नहीं आता, हमें उसकी इबादत करनी चाहिए और मुसीबत के समय उसी की शरण में आना चाहिए, तो यह वास्तव में अल्लाह का धर्म है। इसके विपरीत यदि हमें कोई मुस्लिम, ईसाई या हिन्दू धर्म गुरु बताए कि अल्लाह मानव जाति के लिए ज्ञात किसी भी रूप में अवतरित होता है, हमें किसी व्यक्ति, नबी, पुजारी या संत के माध्यम से अल्लाह की इबादत करनी चाहिए एवं उसकी शरण में आना चाहिए, तो यह मानव की तरफ से है।... More
इस्लाम धर्म की शिक्षाएँ लचीली तथा जीवन के सभी पहलुओं को शामिल हैं, इसलिए कि यह इंसानी स्वभाव से जुड़ा हुआ है, जिसपर अल्लाह ने इंसान को पैदा किया है। यह धर्म इस स्वभाव के नियमों के अनुरूप आया है और वे (नियम निम्नलिखित) हैं :
केवल एक अल्लाह पर ईमान और इस बात पर विश्वास कि वही सृष्टिकर्ता है, जिसका कोई साझी नहीं है और न ही कोई संतान है। वह किसी मनुष्य, जानवर, मूर्ति या पत्थर के आकार में प्रकट नहीं होता है और तीनों में से तीसरा भी नहीं है। बिना किसी मध्यस्थ के केवल इसी एक सृष्टिकर्ता की इबादत करना। वही ब्रह्मांड और इसमें मौजूद सारी चीज़ों का निर्माता है। उस जैसा कोई नहीं है। इंसान को केवल उसी सृष्टिकर्ता की इबादत करनी है। किसी गुनाह से तौबा करते या उससे मदद माँगते समय किसी पुजारी, संत या किसी मध्यस्थ के बिना सीधे उसी से संबंध स्थापित करना है। सारे संसारों का पालनहार अपनी सृष्टि पर उससे कहीं अधिक दयालु है, जितना एक माँ अपनी संतान पर होती है। वह उन्हें तब-तब क्षमा कर देता है, जब-जब वे उसकी ओर लौटते हैं और तौबा करते हैं। अल्लाह का अधिकार है कि केवल उसी की इबादत की जाए एवं इंसान का अधिकार यह है कि उसका उसके रब के साथ सीधा संबंध हो।
इस्लाम धर्म का अक़ीदा स्पष्ट, प्रमाणित एवं सरल है। अंधविश्वास से बिल्कुल दूर। इस्लाम दिल और अंतरात्मा को संबोधित करने और विश्वास के आधार के रूप में उनपर भरोसा करने पर बस नहीं करता है, बल्कि साथ-साथ संतोषजनक तर्क, स्पष्ट दलील एवं सही कारण भी बताता है, जो दिमागों पर छा जाते हैं और दिलों में घर कर जाते हैं और यह हुआ :... More
ईमान के स्तम्भ निम्नलिखित हैं :
अल्लाह पर ईमान : ''इस बात का दृढ़ विश्वास कि अल्लाह हर चीज़ का रब एवं मालिक है। वही अकेला सृष्टिकर्ता है। वही इबादत, दीनता और अधीनता का अधिकारी है। वह पूर्णता की विशेषताओं से विशिष्ट है। हर कमी से पाक है। इन बातों पर प्रतिबद्धता हो एवं उनके अनुसार अमल किया जाए।'' [70] ''सियाज अल-अक़ीदह अल-ईमान बिल्लाह'', अब्दुल अज़ीज़ अल-राजिही, पृष्ठ: 9
फ़रिश्तों पर ईमान : उनके अस्तित्व को सच मानना और इस बात पर विश्वास रखना कि वे नूर से बनी सृष्टि हैं, जो अल्लाह का अज्ञापालन करती है और उसकी अवज्ञा नहीं करती।... More
मानवता के मार्गदर्शन लिए भेजे गए सभी नबियों एवं रसूलों पर ईमान, ईमान के स्तम्भों में से एक स्तम्भ है। इसके बगैर किसी का ईमान सही नहीं होता है। किसी भी नबी या रसूल का इंकार दीन की बुनियादी बातों के ख़िलाफ़ है। अल्लाह के सभी नबियों ने अंतिम रसूल -उनपर अल्लाह की शांति हो- के आने का सुसमाचार दिया था। इसी प्रकार विभिन्न समुदायों की ओर अल्लाह के द्वारा भेजे गए नबियों एवं रसूलों के नामों का उल्लेख क़ुरआन में हुआ है, जैसा कि नूह, इब्राहीम, इसमाईल, इसहाक़, याक़ूब, यूसुफ, मूसा, दाऊद, सुलैमान, ईसा आदि -उन सब पर अल्लाह की शांति अवतरित हो-। जबकि कुछ नबियों एवं रसूलों के नाम नहीं भी लिए गए हैं। यह सम्भव है कि हिन्दू एवं बौद्ध मत के कुछ धार्मिक प्रतीक जैसे राम, कृषणा और गौतम बुद्ध भी नबी हों, जिन्हें अल्लाह ने भेजा हो। परन्तु क़ुरआन में इसका कोई प्रमाण नहीं है, इस कारण मुसलमान इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। विभिन्न धर्मों में उस समय कई अंतर प्रकट हो गए, जब लोग अपने नबियों के सम्मान में सीमा से आगे बढ़ गए और अल्लाह के सिवा उनकी इबादत करने लगे।
''तथा (ऐ नबी!) हम आपसे पहले बहुत-से रसूलों को भेज चुके हैं, जिनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका हाल हम आपसे वर्णन कर चुके हैं तथा उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके हाल का वर्णन हमने आपसे नहीं किया है। तथा किसी रसूल के वश में यह नहीं था कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना कोई आयत (चमत्कार) ले आए। फिर जब अल्लाह का आदेश आ गया, तो सत्य के साथ निर्णय कर दिया गया और उस समय झूठे लोग घाटे में रहे।'' [73] “रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए जो उसकी तरफ़ अल्लाह की ओर से उतारी गई है और मुसलमान भी ईमान लाए। यह सब अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए। उसके रसूलों में से किसी के बीच हम फर्क नहीं करते। उन्होंने कहा कि हमने सुना और अनुसरण किया। हम तुझसे क्षमा माँगते हैं हे हमारे रब! और हमें तेरी ही तरफ़ लौटना है।" [74]
[सूरा ग़ाफ़िर : 78] ''(ऐ मुसलमानो!) तुम सब कहो कि हम अल्लाह पर ईमान लाए तथा उस (क़ुरआन) पर जो हमारी ओर उतारा गया और उसपर जो इब्राहीम, इसमाईल, इसहाक़, याक़ूब तथा उनकी संतानों की ओर उतारा गया और जो मूसा तथा ईसा को दिया गया तथा जो दूसरे नबियों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया। हम इनमें से किसी के बीच अंतर नहीं करते और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।'' [75]... More
जहाँ तक फ़रिश्तों की बात है, तो यह अल्लाह की सृष्टियों में से एक महान सृष्टि हैं, जो नूर से पैदा किए गए हैं। उन्हें अच्छा करने के लिए बनाया गया है। वे अल्लाह के आदेशों का पालन करते हैं। अल्लाह की पाकी बयान करते हैं। इबादत करते हैं। न थकते हैं और न आलस्य करते हैं।
''वे रात और दिन उसकी पवित्रता का गान करते हैं तथा आलसस्य नहीं करते।" [76] "वे अवज्ञा नहीं करते अल्लाह के आदेश की तथा वही करते हैं, जिसका आदेश उन्हें दिया जाए।" [77]
[अल-अंबिया : 20] उनपर ईमान मुसलमानों, यहूदियों एवं ईसाइयों के बीच एक साझे की चीज़ है। उनमें से एक फ़रिश्ते का नाम जिबरील -अलैहिस्सलाम- है, जिन्हें अल्लाह ने अपने एवं अपने रसूलों के बीच मध्यस्थ बनाया है। वह उनके पास वह्य (प्रकाशना) लेकर आते थे। एक और फ़रिश्ता मिकाईल -अलैहिस्सलाम- हैं। उनका काम बारिश बरसाना एवं पौधे उगाना है। एक और फ़रिश्ता इसराफील -अलैहिस्सलाम- हैं।। उनकी ज़िम्मेदारी क़यामत के दिन सूर फूंकना है। इस तरह के और भी फ़रिश्ते हैं।... More
अस्तित्व और घटनाओं के दृष्टांत, सभी इस बात को इंगित करते हैं कि जीवन में हमेशा निर्माण और पुनर्निर्माण का काम चलता रहता है। इसके बहुत सारे उदाहरण हैं, जैसा कि धरती की मृत्यु के बाद बारिश के द्वारा उसे दोबारा जीवित किया जाना इत्यादि।
''वह जीवित को मृत से निकालता है तथा मृत को जीवित से निकालता है और धरती को उसके मृत हो जाने के बाद जीवित करता है। और इसी प्रकार, तुम (भी) निकाले जाओगे।'' [79] मरने के बाद जीवित होकर उठने का और एक प्रमाण ब्रह्मांड की मज़बूत व्यवस्था है, जिसमें कोई खराबी नहीं है। यहाँ तक कि परमाणु में मौजूद एक असीम रूप से छोटा इलेक्ट्रॉन भी एक कक्षा से दूसरी कक्षा में तब तक नहीं जा सकता, जब तक कि वह अपनी गति के बराबर ऊर्जा नहीं देता या नहीं लेता। आप इस प्रणाली में कैसे कल्पना कर सकते हैं कि रोई हत्यारा या उत्पीड़क सारे संसार के रब द्वारा हिसाब-किताब लिए जाने या दंडित किए बिना भाग सकेगा?
[सूरा अल-रूम : 19]... More
अल्ला मुर्दों को उसी तरह ज़िन्दा करेगा, जिस तरह उन्हें पहली बार पैदा किया है।
अल्लाह तआला ने कहा है :
''ऐ लोगो! यदि तुम (मरणोपरांत) उठाए जाने के बारे में किसी संदेह में हो, तो निःसंदेह हमने तुम्हें तुच्छ मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य की एक बूँद से, फिर रक्त के थक्के से, फिर माँस की एक बोटी से, जो चित्रित तथा चित्र विहीन होती है, ताकि हम तुम्हारे लिए (अपनी शक्ति को) स्पष्ट कर[3] दें, और हम जिसे चाहते हैं गर्भाशयों में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर हम तुम्हें एक शिशु के रूप में निकालते हैं, फिर ताकि तुम अपनी जवानी को पहुँचो, और तुममें से कोई वह है जो उठा लिया जाता है, और तुममें से कोई वह है जो जीर्ण आयु की ओर लौटाया जाता है, ताकि वह जानने के बाद कुछ न जाने। तथा तुम धरती को सूखी (मृत) देखते हो, फिर जब हम उसपर पानी उतारते हैं, तो वह लहलहाती है और उभरती है तथा हर प्रकार की सुदृश्य वनस्पतियाँ उगाती है।'' [82] कह दीजिए कि उन्हें वह ज़िन्दा करेगा, जिसने उन्हें पहली बार पैदा किया, जो सब प्रकार की पैदाइश को अच्छी तरह जानने वाला है।'' [83]... More
जिस प्रकार अल्लाह अपने बन्दों को एक ही समय में जीविका प्रदान करता है, उसी प्रकार वह उन का हिसाब लेगा।
''और तुम्हें उत्पन्न करना और पुनः जीवित करना केवल एक प्राण के समान है। निःसंदेह, अल्लाह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।'' [85] [सूरा लुक़मान : 28]
ब्रह्मांड में सब कुछ अल्लाह के नियंत्रण में है। वह अकेला ही व्यापक ज्ञान, पूर्ण जानकारी और सब कुछ अपनी इच्छा के अधीन करने की क्षमता और शक्ति रखता है। सृष्टि की शुरुआत से ही सूर्य, ग्रह और आकाशगंगाएँ अत्यधिक सटीकता के साथ काम कर रही हैं और यह सटीकता और क्षमता मनुष्य की रचना पर समान रूप से लागू होती है। मानव शरीर और उनकी आत्माओं के बीच मौजूद सामंजस्य से पता चलता है कि इन आत्माओं का जानवरों के शरीर में वास करना संभव नहीं है और वे पौधों, कीड़ों और यहाँ तक कि लोगों के बीच भी चक्कर नहीं लगा सकतीं। अल्लाह ने मनुष्य को बुद्धि और ज्ञान से दिया है, उसे धरती पर खलीफा बनाया है, उसे श्रेष्ठता दी है, सम्मान दिया है एवं दूसरी बहुत सारी सृष्टियों पर उसके दर्ज़ा को ऊँचा किया है। सृष्टिकर्ता की हिकमत एवं न्याय की माँग यह थी कि क़यामत का दिन हो, जिस दिन अल्लाह सभी सृष्टियों को दोबारा उठाएगा और अकेला ही उनका हिसाब लेगा। फिर उसके बाद उनका ठिकाना जन्नत होगा या जहन्नम और उस दिन हर तरह के बुरे या अच्छे कामों को तौला जाएगा।
"तो जिसने कण के बराबर भी पुण्य (नेकी) किया होगा, वह उसे देख लेगा। और जिसने कण के बराबर भी पाप किया होगा, वह उसे देख लेगा।'' [86] अल्लाह लोगों से अपने अज़ली (जो हमेशा से है) ज्ञान के अनुसार लिखे गए कर्मों का हिसाब कैसे लेगा, जिसे क़ज़ा एवं क़द्र के नाम से जाना जाता है?
उदाहरण के तौर पर जब कोई व्यक्ति किसी स्टोर से कुछ खरीदना चाहे और अपने बड़े बेटे को वह चीज़ खरीदने को भेजने का फैसला करे कि उसे पहले से मालूम था कि उसका यह बेटा समझदार है, वह सीधे जाएगा और वह चीज़ खरीद लाएगा, जो उसका पिता चाहता है, जबकि उसे पता हो कि उसका दूसरा बेटा अपने साथियों के साथ खेलने लगेगा और पैसा नष्ट कर देगा। वास्तव में, यह एक कल्पना है, जिसपर पिता ने अपने निर्णय की बुनियाद रखी है।
भाग्यों की जानकारी हमारे एख्तियार के इरादे के विरुद्ध नहीं है। हमारी नीयतों एवं एख़्तियारों के बारे में अपने पूर्ण ज्ञान की बुनियाद पर अल्लाह हमारे कामों को जानता है। दरअसल अल्लाह इन्सान के मिज़ाज को जानता है। उसने हम सब को पैदा किया है और हमारे दिलों में भलाई या बुराई की जो इच्छाएँ हैं, वह उन्हें जानता है। वह हमारी नीयतों एवं कामों का भी ज्ञान रखता है। इस ज्ञान का उसके पास लिखा हुआ होना हमारे चयन करने के इरादे के विरुद्ध नहीं है। साथ ही यह भी ज्ञात हो कि अल्लाह का ज्ञान व्यापक है और मानव की आशाएँ कभी सच साबित होती हैं, तो कभी झूठ।
हो सकता है कि इंसान ऐसा काम करे जो अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हो, परन्तु उसका यह काम अल्लाह के इरादे के विरूद्ध नहीं है। अल्लाह ने अपनी सृष्टि को चुनने का इरादा दिया है, मगर उनके यह काम, यद्यपि उनमें गुनाह हों, अल्लाह के इरादे के तहत ही हैं। ये उसके इरादे के ख़िलाफ़ नहीं हो सकते। इसलिए कि अल्लाह ने अपने इरादे से आगे बढ़ने की अनुमति किसी को नहीं दी है।... More
जीवन का मुख्य उद्देश्य सुख की अस्थायी अनुभूति का आनंद लेना नहीं, बल्कि अल्लाह को जानकर और उसकी आराधना करके गहरी आंतरिक शांति प्राप्त करना है।
इस लक्ष्य को प्राप्त करना शाश्वत आनंद और सच्चे सुख की ओर ले जाएगा। अतः, जब यह हमारा प्राथमिक लक्ष्य है, तो इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी समस्या या परेशानी का सामना करना आसान होगा।
आएँ किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें, जिसने कभी किसी पीड़ा या दर्द का अनुभव नहीं किया है। वह व्यक्ति, अपने विलासितापूर्ण जीवन के कारण, अल्लाह को भूल गया है और इस प्रकार वह वह कार्य करने में विफल रहा जिसके लिए उसे बनाया गया था। इस व्यक्ति की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से करें, जिसके कष्ट और पीड़ा के अनुभवों ने उसे अल्लाह तक पहुँचाया है और उसने जीवन में अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लिया है। इस्लामी शिक्षाओं के दृष्टिकोण से, वह व्यक्ति जिसकी पीड़ा उसे अल्लाह की ओर ले गई, उस व्यक्ति से बेहतर है, जिसने कभी दुख नहीं उठाया और जिसके आनंदों ने उसे अल्लाह से दूर कर दिया।... More
परीक्षा छात्रों के रैंक और ग्रेड निर्धारित करने के लिए आयोजित की जीती है, जब वे नया व्यवहारिक जीवन शुरू करते हैं। हालांकि परीक्षा छोटी चीज़ होती है, परन्तु यह आगे के नए जीवन में छात्र के भाग्य का फैसला करती है। इसी तरह, इस संसार का जीवन छोटा होने के बावजूद, मनुष्यों के लिए परीक्षण और परीक्षा के समान है, ताकि जब वे बाद के जीवन की ओर जाएँ, तो उनके ग्रेड और रैंक का निर्धारण किया जा सके। इंसान इस दुनिया से भौतिक चीज़ों के साथ नहीं, बल्कि अपने कार्यों के साथ जाता है। इंसान को समझना चाहिए कि उसे इस दुनिया में आख़िरत के जीवन और उसमें बदला पाने के लिए काम करना है।
इंसान को सुख अल्लाह के सामने झुकने, उसकी आज्ञा का पालन करने और उसके निर्णय और भाग्य से संतुष्ट होने से प्राप्त होता है।
बहुत-से लोग दावा करते हैं कि सब कुछ आंतरिक रूप से अर्थहीन है, इस लिए हम एक आनंदपूर्ण जीवन पाने के उद्देश्य से अपने लिए (जीवन) का स्वयं एक अर्थ (लक्ष्य) बना सकते हैं। हमारे अस्तित्व के उद्देश्य को नकारना वास्तव में अपने आप को धोखा देना है। जैसे हम अपने आप से कह रहे हों कि "आइए कल्पना करें या दिखावा करें कि हमारे जीवन का एक उद्देश्य है।" जैसे हम उन बच्चों की तरह हैं जो डॉक्टर और नर्स या माता और पिता बनकर खेलने का नाटक करते हैं। जब तक हम जीवन के उद्देश्य को जान नहीं लेते, तब तक हमें सुख नहीं मिल सकता।
यदि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध लग्जरी ट्रेन में बिठा दिया जाए। वह प्रथम श्रेणी में यात्र कर रहा हो, एक शानदार और आरामदायक अनुभव हो और विलासिता की पराकाष्ठा हो। क्या वह उसके दिमाग में घूम रहे इन सवालों के जवाब मिले बिना इस यात्रा से खुश हो सकेगा कि वह मैं ट्रेन में कैसे चढ़ा? इस यात्रा का उद्देश्य क्या है? ट्रेन कहाँ जा रही है? यदि ये प्रश्न अनुत्तरित रहें, तो वह कैसे प्रसन्न हो सकता है? भले ही वह अपने तहत सभी विलासिता का आनंद लेना शुरू कर दे, फिर भी वह कभी भी सच्चा और सार्थक आनंद प्राप्त नहीं करे सकेगा। क्या इस यात्रा में स्वादिष्ट भोजन उसके इन सवालों को भूलने के लिए पर्याप्त है? दरअसल इस तरह की खुशी अस्थायी और नकली होगी और इन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब खोजने के विषय को जानबूझकर अनदेखा करके ही ऐसी खुशी प्राप्त किया जा सकती है। यह नशे की वजह से पैदा होने वाली एक हालत की तरह है, जो नशा करने वाले को विनाश की ओर ले जाती है। इस प्रकार, मनुष्य को सच्चा सुख तब तक प्राप्त नहीं हो सकता, जब तक कि वह इन अस्तित्वगत प्रश्नों के उत्तर न खोज ले।... More
हाँ, इस्लाम सबके लिए उपलब्ध है। हर बच्चा अपनी असली फ़ितरत पर पैदा होता है। बिना किसी मध्यस्थ के अपने अल्लाह की इबादत करने वाला (मुसलमान) होकर। माता-पिता, स्कूल या किसी धार्मिक पक्ष के हस्तक्षेप के बिना, वह वयस्क होने तक सीधे अल्लाह की इबादत करता है। फिर वह अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार और जवाबदेह बन जाता है। वयस्क होने के बाद या तो मसीह -अलैहिस्सलाम- को अपने और अल्लाह के बीच मध्यस्थ बना लेता है और फलस्वरूप ईसाई बन जाता है, बुद्ध को मध्यस्त बना लेता है और नतीजे के तौर बौद्ध हो जाता है, कृष्ण को को मध्यस्थ बनाकर हिन्दू हो जाता है, मुहम्मद को मध्यस्थ बनाकर इस्लाम से बिल्कुल दूर हो जाता है या फिर दीन-ए-फ़तरत पर बाक़ी रहता है और एकमात्र अल्लाह की इबादत करता है। मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के द्वारा अपने रब के पास से लाए हुए संदेश का पालन करना ही सत्य धर्म है और यही धर्म सही फ़ितरत के अनुरूप भी है। उसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह विकृत है, यद्यपि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को इंसान एवं अल्लाह के बीच मध्यस्थ बनाना ही क्यों न हो।
"प्रत्येक पैदा होने वाला शिशु फितरत (इसलाम ) पर जन्म लेता है। फिर उसके माता-पिता उसे यहूदी बना देते हैं, ईसाई बना देते हैं या मजूसी (अग्नि पूजक) बना देते हैं।" [88] विभिन्न धर्मों के बीच संवाद के बारे में इस्लाम की क्या राय है?
सृष्टिकर्ता की तरफ से आने वाला सत्य धर्म अनेक नहीं, केवल एक है। वह है, एक अल्लाह पर ईमान और केवल उसकी इबादत करना। उसके अतिरिक्त जितने भी धर्म हैं, सब मानव निर्मित हैं। उदाहरण स्वरूप हम भारत की यात्रा करें और लोगों के सामने कहें कि सृष्टिकर्ता एक है, तो सभी एक आवाज़ में कहेंगे कि हाँ, हाँ, सृष्टिकर्ता एक है और वास्तव में यही उनकी पवित्र पुस्तकों में लिखा हुआ भी है। [89] परन्तु एक मुख्य बिंदु पर वे मतभेद करेंगे और लड़ पड़ेंगे और हो सकता है कि एक-दूसरे की हत्या पर उतर आएँ। वह है, वह छवि और रूप जिसे धारण करके ईश्वर पृथ्वी में प्रकट होता है। उदाहरण के तौर पर भारतीय ईसाई कहेंगे ईश्वर एक है, लेकिन वह तीन व्यक्तियों (पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा) में देहधारी होता है। जबकि भारतीय हिन्दुओं में से कुछ कहेंगे कि ईश्वर जानवर, इंसान या मूर्ति के रूप में प्रकट होता है। हिंदू धर्म के (चंदुजा उपनिषद 6 : 1-2) में है: ''वह केवल एक पूज्य है, उसका कोई दूसरा नहीं है।'' (वेद, स्वेता स्वातार उपनिषद :19ः4, 20ः4, 6:9) में है : ''पूज्य के न तो पिता हैं और न ही स्वामी।'' ''उसे देखना संभव नहीं, उसे कोई आँख से नहीं देखता।'' ''उस जैसा कोई नहीं है।'' (यजुर्वेद 40:9) में है : ''अंधेरे में प्रवेश करते हैं, जो लोग प्राकृतिक तत्त्वों (वायु, जल, अग्नि आदि) की उपासना करते हैं। अंधेरे में डूबते हैं : जो संबुति (हाथ से बनी हुई चीज़ें जैसे मुर्ति एवं पत्थर आदि।) की पूजा करने वाले हैं। ईसाई धर्म में : (मैथ्यू 4:10) में है : ''उस समय यसू ने उससे कहा : जाओ हे शैतान, यह लिखा हुआ है, तेरे पूज्य रब के लिए सजदा कर और उसी की इबादत कर।'' (निर्गमन 20: 3-5) में है : ''मेरे सामने और कोई देवता न रखना। न तो अपने लिये तराशी हुई मूरत बनाना, और न कोई चित्र, न ऊपर आकाश में, न नीचे पृथ्वी पर, और न पृथ्वी के नीचे जल के अंदर। उनकी उपासना न कर। क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर ईर्ष्यालु (गैरतमंद) पूज्य हूं, जो मुझसे बैर रखने वालों की तीसरी और चौथी पीढ़ी के पितरों के पापों को प्रायश्चित करता है।"
यदि इंसान गहराई से सोचे तो पाएगा कि धार्मिक गिरोहों और स्वयं धर्मों के बीच सभी समस्याओं एवं मतभेदों का कारण वह मध्यस्थ हैं, जिन्हें इंसान उनके एवं उनके सृष्टिकर्ता के बीच बना लेता है। उदाहरण के तौर पर कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट आदि संप्रदाय, हिंदू संप्रदाय से निर्माता के साथ संवाद करने के तरीके पर भिन्न हैं, स्वयं निर्माता के अस्तित्व की अवधारणा पर नहीं। यदि वे सभी सीधे ईश्वर की इबादत करें, तो एक हो जाएंगे।
उदाहरण के तौर पर पैगंबर इब्राहिम -उनपर शांति हो- के समय में एक अल्लाह की इबादत करने वाला इस्लाम धर्म पर था। वही सत्य धर्म माना जाता था। लेकिन किसी पुजारी या संत को अपने और अपने रचयिता के बीच मध्यस्थ बनाने वाला गलत था। इब्राहीम -उनपर शांति हो- के अनुयायी केवल एक अल्लाह की पूजा करने तथा यह गवाही देने पर बाध्य थे कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूज्य) नहीं है और इब्राहीम अल्लाह के रसूल हैं। अल्लाह तआलान ने मूसा -उनपर शांति हो- को इब्राहीम -उनपर शांति हो- के संदेश की पुष्टि के लिए भेजा, तो इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- के अनुयायियों पर नए नबी को स्वीकार करना और यह गवाही देना ज़रूरी हो गया कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है तथा मूसा व इब्राहीम अल्लाह के रसूल हैं। उस समय जो बछड़े की पूजा करता था, वह ग़लत रास्ते पर था।... More
इस्लाम धर्म आह्वान, सहिष्णुता और अच्छे तरीके से की जाने वाली बहस पर आधारित है।
"(ऐ नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार के मार्ग (इस्लाम) की ओर हिकमत तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करें, जो सबसे उत्तम है। निःसंदेह आपका पालनहार उसे सबसे अधिक जानने वाला है, जो उसके मार्ग से भटक गया और वही सीधे मार्ग पर चलने वालों को भी अधिक जानने वाला है।'' [90] [सूरा अल-नह्ल : 125]
पवित्र क़रआन अंतिम आकाशीय पुस्तक है और पैगंबर मुहम्मद अंतिम पैगंबर हैं। चुनांचे इस्लाम की अंतिम शरीयत सभी के लिए बातचीत करने और धर्म की बुनियादों और सिद्धांतों पर चर्चा करने का मार्ग खोलती है। यह सिद्धांत कि ''धर्म में कोई बाध्यता नहीं है'' इस्लामी धर्म के साये में संरक्षित है। वह, दुसरों के सम्मान का ख़याल रखते हुए, किसी को भी सटीक एवं स्वाभाविक इसलामी विश्वास को अपनाने पर मजबूर नहीं करता। लेकिन दूसरों को भी अपने धर्म पर बने रहने एवं अमन और सुरक्षा प्राप्त करने के बदले में इस्लामी राष्ट्र के नियमों का पालन करना है।... More
ज्ञानोदय की इस्लामी अवधारणा विश्वास और विज्ञान की ठोस नींव पर आधारित है, जो विवेक के ज्ञान और हृदय के ज्ञान को पहले अल्लाह पर ईमान के साथ और फिर विज्ञान के साथ जोड़ती है, जो ईमान से अलग नहीं हो सकता।
यूरोपीय ज्ञानोदय की अवधारणा को अन्य पश्चिमी अवधारणाओं की तरह इस्लामी समाजों में स्थानांतरित कर दिया गया है। इस्लामी अवधारणा में ज्ञानोदय केवल ऐसे दिमाग पर निर्भर नहीं होता है, जिसे ईमान का प्रकाश प्राप्त न हो। उसी तरह किसी व्यक्ति को अपने ईमान का लाभ नहीं होता है, यदि वह बुद्धि की नेमत को, सोच, चिंतन, विचार और मामलों को इस तरह से प्रबंधित करने में उपयोग नहीं करता है, जिससे सार्वजनिक हित प्राप्त हो, जो लोगों को लाभान्वित करता हो और धरती पर बाक़ी रहता हो।
मध्य काल के अंधकार में मुसलमानों ने सभ्यता के प्रकाश को बहाल किया, जो पश्चिम और पूरब के सभी देशों, यहाँ तक कि कांस्टेंटिनोपल में भी बुझ चुका था।... More
डार्विन के कुछ अनुयायी, जो प्राकृतिक चयन (एक तर्कहीन भौतिक प्रक्रिया) को एक अनूठा रचनात्मक शक्ति मानते थे, जो बिना किसी वास्तविक प्रायोगिक आधार के सभी कठिन विकासवादी समस्याओं को हल करती है। बाद में उन्होंने जीवाणु कोशिकाओं की संरचना और कार्य में डिजाइन की जटिलता की खोज की। उन्होंने "स्मार्ट" बैक्टीरिया, "माइक्रोबियल इंटेलिजेंस", "निर्णय की रचना" और "समस्या को सुलझाने वाले बैक्टीरिया" जैसे वाक्यांशों का उपयोग करना शुरू कर दिया। इस तरह बैक्टीरिया उनका नया भगवान बन गया। [104]
सृष्टिकर्ता ने अपनी पुस्तक में तथा अपने रसूल की ज़ुबान में यह स्पष्ट किया है कि स्मार्ट बैक्टीरिया के साथ जिन कार्यों का संबंध जोड़ा जाता है, वे वास्तव में संसारों के रब के कार्य हैं, जो उसके ज्ञान और इच्छा के अनुसार सम्पन्न होते हैं।
"अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला तथा वही प्रत्येक वस्तु का रक्षक है।" [105] [सूरा अल-ज़ुमर : 62]... More
इस्लाम इस विचार को पूरी तरह से खारिज करता है और क़ुरआन ने यह स्पष्ट किया है कि अल्लाह तआला ने इंसान के सम्मान के तौर पर आदम -अलैहिस्सलाम- को दूसरी सभी सृष्टियों से अलग करके पैदा किया है, ताकि उसको धरती पर अपना ख़लीफ़ा बनाने के रब के उद्देश्य की प्राप्ति हो।
डार्विन के अनुयायी ब्रह्मांड के निर्माता के अस्तित्व में विश्वास करने वाले को एक पिछड़ा इंसान मानते हैं, क्योंकि वह उस चीज़ में विश्वास रखता है, जिसे उसने नहीं देखा है। मोमिन उसपर विश्वास रखता है, जो उसकी स्थिति को ऊंचा करता है और उसके दर्जे को बुलंद करता है, जबकि नास्तिक उसपर विश्वास रखते हैं, जो उन्हें नीचा और कम करता है। जो भी हो, प्रश्न यह है कि बाकी वानर अब तक बाकी इंसान के रूप में विकसित क्यों नहीं हुए?
सिद्धांत परिकल्पनाओं का एक समूह है। ये परिकल्पनाएँ किसी विशेष प्रत्यक्ष को देखने या उसपर विचार करने से आती हैं और इन परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए, सफल प्रयोग या प्रत्यक्ष अवलोकन की आवश्यकता होती है, जो इस परिकल्पना को वैधता प्रदान करे। यदि सिद्धांत से संबंधित परिकल्पनाओं में से कोई एक सिद्ध न की जा सके, न तो प्रयोग द्वारा और न ही प्रत्यक्ष अवलोकन से, तो सिद्धांत पर पूरी तरह से पुनर्विचार किया जाएगा।... More
विज्ञान एक सामान्य वंश से विकास की अवधारणा पर ठोस सबूत प्रदान करता है, जिसका जिक्र पवित्र क़ुरआन ने किया है।
''और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई है। क्या वे ईमान नहीं लाते?'' [111] अल्लाह तआला फ़रमाता है :
[सूरा अल-अंबिया : 30] सर्वशक्तिमान ईश्वर ने जीवित प्राणियों को बुद्धिमान और फितरी तौर पर ऐसा बनाया है कि वे अपने आसपास के वातावरण के अनुकूल हों। वे आकार, शक्ल या लंबाई में विकसित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अन्य देशों के विपरीत ठंडे देशों में भेड़ों का एक विशिष्ट आकार और खाल होती है, जो उन्हें ठंड से बचाती है। हवा के तापमान के अनुसार ऊन बढ़ता या घटता है। पर्यावरण के अनुसार आकार और प्रकार भिन्न होते हैं। यहाँ तक कि मनुष्य भी अपने रंग, गुण, भाषा और आकार में भिन्न होते हैं कि कोई भी मनुष्य दूसरे जैसा नहीं है। परन्तु, वे मनुष्य ही रहते हैं, दूसरे प्रकार के पशु में परिवर्तित नहीं होते हैं।... More
पवित्र क़ुरआन ने आदम -अलैहिस्सलाम- की रचना की कहानी बताकर विकासवाद की अवधारणा को ठीक किया है :
जब इंसान का कोई अस्तित्व नहीं था :
"निश्चय इनसान पर ज़माने का एक ऐसा समय भी गुज़रा है, जब वह कोई ऐसी चीज़ नहीं था जिसका (कहीं) उल्लेख हुआ हो।'' [114] आदम -अलैहिस्सलाम- की रचना का अरंभ मिट्टी से हुआ :... More
लोगों के बीच विभिन्न सिद्धांतों और विश्वासों के पाए जाने का मतलब यह नहीं है कि एक सच्चे सत्य का अस्तित्व नहीं है। उदाहरण के तौर पर एक काली कार के मालिक द्वारा उपयोग किए जाने वाले यातायात के साधन के बारे में लोगों की अवधारणाएं और कल्पनाएं चाहे कितनी ही क्यों न हों, इस बात का इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके पास एक काली कार है। अब अगर पूरी दुनिया माने कि इस व्यक्ति की कार लाल है, तो यह विश्वास इसे लाल नहीं बनाता है। केवल एक ही सच्चाई है और वह यह है कि यह एक काली कार है।
उसी प्रकार किसी चीज़ की वास्तविकता के बारे में अवधारणाओं और कल्पनाओं की बहुलता इस चीज़ के लिए एक निश्चित वास्तविकता के अस्तित्व को नकारती नहीं है।
अस्तित्व की उत्पत्ति के बारे में लोगों की जितनी भी धारणाएं और कल्पनाएं हों, यह इस सत्य के अस्तित्व को नकारती नहीं हैं कि वह एक अकेला सृष्टिकर्ता है, उसका कोई आकार नहीं है जिसे मानव जानता हो, न उसका कोई साझी है और न ही कोई संतान। उदाहरण के तौर पर अगर पूरी दुनिया यह मान ले कि सृष्टिकर्ता जानवर या इंसान के रूप में अवतरित होता है, तो वह ऐसा नहीं हो जाएगा। अल्लाह तआला इन सब चीज़ों से पाक एवं उच्च है।... More
यह अतार्किक है कि अपनी ख़्वाहिश से निर्देशित मानव निर्धारित करे कि बलात्कार बुरा है कि नहीं। यह स्पष्ट है कि बलात्कार अपने आप में मानव अधिकार का उल्लंघन और उसके महत्व एवं स्वतंत्रता को छीन लेना है। यही प्रमाण है इस बात का कि बलात्कार बुरी चीज़ है। साथ ही समलैंगिकता और शादी के अलावा रिश्ते, सार्वभौमिक मानदंडों का उल्लंघन हैं। सही ग़लत नहीं होगा यद्यपि पूरी दुनिया उसे ग़लत कहने पर उतर आए। इसी तरह ग़लत भी सूरज की तरह स्पष्ट है, यद्यपि पूरी मानव जाति उसे सही कहने पर सहमत हो जाए।
इसी तरह इतिहास की बात है। यदि हम यह मान लें कि हर युग के लिए उचित है कि वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार इतिहास लिखे, इसलिए कि महत्वपूर्ण एवं अहम चीज़ को परखने की कसौटी हर युग की दूसरे युग से अलग होती है। परन्तु यह इतिहास को सापेक्ष नहीं बनाता है। इसलिए कि यह इस बात को नकारता नहीं है कि घटनाओं की एक ही वास्तविकता होती है। हम मानें या न मानें। घटनाओं की विकृति तथा अशुद्धता की संभावना रखने वाला और ख़्वाहिश पर आधारित मानव इतिहास सारे संसारों के रब के द्वारा बताए गए इतिहास से अलग है, जिसमें भूत, वर्तवान एवं भविष्य की घटनाओं को बयान करने में कमाल दर्जे की सूक्ष्मता दिखलाई गई है।
एक व्यापक वास्तविकता के अस्तित्व का न होना, जिसे बहुत-से लोग अपनाए हुए हैं, यह अपने आप में ऐसी चीज़ पर ईमान लाना है, जो सही भी है और ग़लत भी। वे इसे दूसरों पर लागू करने की कोशिश करते हैं। वे व्यवहार का एक मानक अपनाते हैं और सभी को इसका पालन करने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसा करके, वे उसी चीज़ का उल्लंघन कर रहे होते हैं, जिसे वे धारण करने का दावा करते हैं। यह एक विरोधाभासी मत है।
एक व्यापक सत्य के अस्तित्व के प्रमाण इस प्रकार हैं :
अंतरात्मा : (आंतरिक आवाज़) नैतिक दिशानिर्देश के नियमों का संग्रह, जो मानव व्यवहार को नियमित करता है। यह दरअसल इस बात का प्रमाण है कि विश्व एक विशेष रास्ते पर चलता है, जिसमें सही भी है और ग़लत भी। यह नैतिक उसूल कुछ सामाजिक पालनों का नाम है, जिनका विरोध करना या उन्हें पूछे जाने का विषय बनाना संभव नहीं है। वे सामाजिक वास्तविकताएं हैं, जिनके अंतर्वस्तु या अर्थ से बेपरवाह होना समाज के लिए संभव नहीं है। जैसा कि माँ-बाप का सम्मान न करने या चोरी करने को हमेशा घृणित व्यवहार माना जाता है। उसे कभी भी सच या सम्मान बताकर उचित ठहराया नहीं जा सकता। यह बात सामान्य रूप से हर समय सभी संस्कृतियों पर लागू होती है।... More
अंतरिक्ष में तैर रही पृथ्वी पर मनुष्यों की उपस्थिति ऐसे ही है, जैसे विभिन्न संस्कृतियों से संबंध रखने वाले यात्री एक विमान पर एकत्र हो जाएँ और वह उन्हें अज्ञात दिशा की ओर ले जाए और यह पता न हो कि विमान को चला कौन रहा है। लोग विमान पर खुद अपनी सेवा आप करने और परेशानियों को सहन करने पर मजबूर हों।
ऐसे में उनके पास पायलट की तरफ से केबिन क्रू के एक सदस्य द्वारा एक संदेश आए, जो उन्हें समझाए कि वे वहां क्यों हैं, उन्होंने कहाँ उड़ान भरी और कहां जा रहे हैं और उन्हें पायलट के व्यक्तिगत गुण और उनके साथ सीधे संवाद करने का तरीका बताए।
इसपर पहला यात्री कहे कि हाँ, यह स्पष्ट है कि विमान में एक चालक है और वह दयालु है, क्योंकि उसने इस व्यक्ति को हमारे सवालों के जवाब देने के लिए भेजा है।... More
उदाहरण के तौर पर क्या ईसाई यह नहीं मानते कि मुसलमान काफ़िर है, क्योंकि वह ट्रिनिटी के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता और उनकी मान्यता अनुसार उसपर विश्वास किए बिना (आकाश में) नेक लोगों के स्थान में प्रवेश संभव नहीं है। शब्द ''कुफ़्र'' का अर्थ सत्य का इंकार है। एक मुसलमान के लिए सत्य तौहीद (एकेश्वरवाद) है, जबिक ईसाई के लिए सत्य ट्रिनिटी है।
क़ुरआन सारे संसारों के रब द्वारा भेजी गई सबसे आखिरी किताब है। मुसलमान उन सभी पुस्तकों पर विश्वास रखते हैं, जो क़ुरआन से पहले उतारी गई थीं, जैसे कि इब्राहिम के स़हीफ़े, ज़बूर, तोरात और इंजील आदि। मुसलमानों का मानना है कि सभी पुस्तकों का वास्तविक संदेश तौहीद-ए-खालिस (शुद्ध एकेश्वरवाद) अर्थात एक अल्लाह पर ईमान एवं केवल उसी की इबादत था। क़ुरआन पूर्व की दूसरी आकाशीय पुस्तकों के विपरीत किसी विशेष गिरोह या जमात केंद्रित नहीं है। न इसके विभिन्न संस्करण पाए जाते हैं और न इसमें कोई बदलाव आया है, बल्कि तमाम मुसलमानों के लिए इसका एक ही संस्करण है। मूल क़ुरआन अभी भी अपनी मूल भाषा (अरबी) में है। बिना किसी बदलाव, विरूपण या परिवर्तन के، वह हमारे समय तक सुरक्षित है और ऐसा ही रहेगा। खुद सारे संसारों के रब ने उसकी सुरक्षा का वचन दिया है। यह सभी मुसलमानों के यहाँ उपलब्ध है, बहुत-से लोगों के सीने में सुरक्षित है और लोगों के पास मौजूद कई भाषाओं में क़ुरआन का वर्तमान अनुवाद, केवल उसके अर्थों का अनुवाद है। अल्लाह ने अरब और गैर-अरब सभी को इस तरह के क़ुरआन की रचना करने की चुनौती दी थी, यह जानते हुए कि उस समय के अरब भाषाज्ञान, साहित्यिक ज्ञान और कविता में दूसरों से अधिक निपुण थे। परन्तु उन लोगों को विश्वास हो गया कि इस क़ुरआन का अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की तरफ से होना असंभव है। यह चुनौती चौदह शताब्दियों से अधिक समय से क़ायम है। परन्तु कोई भी इसे स्वीकार करने में सक्षम नहीं हुआ। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कुरआन अल्लाह की किताब है।
यदि क़ुरआन यहूदियों के यहाँ से लिया गया होता, तो वे खुद बढ़-चढ़कर इसकी निस्बत अपनी ओर कर लेते। लेकिन क्या यहूदियों ने वह्य के उतरने के समय इस तरह का कोई दावा किया?
क्या नमाज़, हज और ज़कात आदि शरई अहकाम तथा अन्य इस्लामी मामलात यहूदियों से भिन्न नहीं हैं? फिर गैर-मुस्लिमों की गवाही पर विचार करें, जो कहती है कि क़ुरआन दूसरी पुस्तकों से भिन्न है, मानव निर्मित नहीं है तथा वैज्ञानिक चमत्कारों से भरा हुआ है। जब किसी आस्था का मानने वाला, उसकी आस्था के विपरीत आस्था को सही कहे, तो यह उसके सही होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह संसार के पालनहार का एकमात्र संदेश है और इसे एकमात्र संदेश होना भी चाहिए। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का लाया हुआ क़ुरआन आपकी जालसाज़ी की नहीं, बल्कि आपके सच्चे नबी होने की दलील है। अल्लाह ने भाषाज्ञान में माहिर अरब और गैर-अरब सब को चुनौती दी है कि वे इस क़ुरआन की तरह एक क़ुरआन या उसकी किसी आयत की तरह एक आयत ही ले आएँ, परन्तु वे विफल रहे। यह चुनौती आज तक क़ायम है।
प्राचीन सभ्यताएँ सही ज्ञानों एवं बहुत सारी किंवदंतियों और मिथकों का संग्रह थीं। एक अशिक्षित नबी जो एक बंजर रेगिस्तान में पला-बढ़ा हो, इन सभ्यताओं से केवल सत्य को लेने और किंवदंतियों को छोड़ देने में कैसे सक्षम हो सकता था?
दुनिया में हजारों भाषाएं और बोलियां हैं। यदि उनमें से किसी भी एक भाषा में उतारा जाता, तो लोग प्रश्न करते कि दूसरी भाषा में क्यों नहीं उतारा गया? अल्लाह प्रत्येक रसूल को उसके समुदाय की भाषा में भेजता है। उसने अपने रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को आख़िरी रसूल के तौर पर चुना, क़ुरआन को उनके समुदाय की भाषा में उतारा और उसे क़यामत के दिन तक विकृत होने से सुरक्षित रखा, जैसा कि उसने मसीह की पुस्तक के लिए आरामी भाषा को चुना।
"और हमने हर नबी (संदेशवाहक) को उसकी कौम की भाषा में ही भेजा है, ताकि उनके सामने स्पष्ट तौर से बयान कर दे।" [126] [सूरा इब्राहीम : 4]
नासिख़ और मंसूख़ शरीयत के आदेशों में विकास का नाम है। मसलन पूर्व के आदेश को लागू करने से रोक देना, बाद में आने वाले किसी आदेश द्वारा उसे बदल देना, मुतलक़ (अनियत) को मुक़ैयद (नियत) करना या मुक़ैयद को मुतलक़ करना। यह आदम -अलैहिस्सलाम- के युग से ही पूर्व की शरीयतों में प्रचलित है। मसलन आदम -अलैहिस्सलाम- के ज़माना में भाई का अपनी सगी बहन से शादी करना जायज़ था, लेकिन बाद की सारी शरीयतों में नाजायज़ हो गया। इसी प्रकार इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- एवं उनके पहले की सभी शरीयतों में शनिवार के दिन काम करना सही था, फिर मूसा -अलैहिस्सलाम- की शरीयत में यह बुरा हो गया। अल्लाह तआला ने बनी इसराईल की बछड़े की इबादत के बाद उन्हें अपने आपकी हत्या करने का आदेश दिया, फिर बाद में उनसे इस आदेश को निरस्त कर दिया। इसके अलावा भी बहुत सारे उदाहरण हैं। एक आदेश को दूसरे आदेश से बदल देना एक ही शरीयत में या दो शरीयतों के बीच होता रहा है, जैसा कि हमने पिछले उदाहरणों में बयान किया।
उहारण स्वरूप, एक डॉक्टर अपने रोगी का एक विशिष्ट दवा द्वारा इलाज करना शुरू करता है और समय के साथ अपने रोगी के इलाज में क्रमशः दवा की खुराक को बढ़ाता या घटाता जाता है। हम उसे हकीम मानते हैं, जबकि अल्लाह के लिए उच्च उदाहरण हैं। इस्लामी आदेशों में नासिख़ तथा मंसूख़ का पाया जाना, दरअसल महान रचनाकार की हिकमत में से है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़ुरआन को अपने विभिन्न साथियों के हाथ में विश्वस्त एवं संकलित रूप में छोड़ा, ताकि उसे पढ़ा और दूसरों को पढ़ाया जा सके। फिर जब अबू बक्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- ख़लीफ़ा बने, तो उन्होंने इन बिखरे हुए सहीफ़ों को एक स्थान में जमा करने का आदेश दिया, ताकि उसको स्रोत (reference) के रूप में प्रयोग किया जा सके। फिर जब उसमान -रज़ियल्लाहु अन्हु- का समय आया, तो उन्होंने विभिन्न शहरों में सहाबा के हाथों में विभिन्न शैलियों में मौजूद क़ुरआन की कॉपियों एवं सहीफ़ों को जलाने का आदेश दिया और उनके पास नई कॉपी, जो रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की छोड़ी हुई एवं अबू बक्र के द्वारा जमा की हुई असली कॉपी के अनुरूप थी, उसको भेज दिया। ताकि इस बात की गारंटी रहे कि सभी शहर रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के द्वारा छोड़ी गई एक मात्र असली कॉपी को स्रोत के रूप में इसतेमाल कर रहे हैं।
क़ुरआन बिना किसी बदलाव या परिवर्तन के वैसे ही बना रहा। वह हर ज़माना में हमेशा मुसलमानों के साथ रहा। वे उसको आपस में आदान-प्रदान करते रहे और नमाज़ों में पढ़ते रहे।
इस्लाम प्रयोगात्मक विज्ञान के विरुद्ध नहीं है। वास्तव में, कई पश्चिमी विद्वान जो अल्लाह में विश्वास नहीं रखते, अपनी वैज्ञानिक खोजों के माध्यम से सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की अनिवार्यता तक पहुंच चुके हैं। इस्लाम अक़्ल और विचार के तर्क को प्रधानता देता है और ब्रह्मांड में सोच-विचार करने को कहता है।
इस्लाम सभी मनुष्यों को अल्लाह की निशानियों और उसकी सृष्टि की अद्भुत रचना पर विचार करने, पृथ्वी का भ्रमण करने, ब्रह्मांड पर गौर करने, तर्क का उपयोग करने और विचार और तर्क को लागू करने का आह्वान करता है। बल्कि, वह क्षितिजों और अपने भीतर एक से अधिक बार विचार करने के लिए कहता है। ऐसा करने से इनसान निश्चित रूप से उन उत्तरों को पा लेगा, जिनकी वह तलाश कर रहा है। वह सृष्टिकर्ता के अस्तित्व पर ज़रूर विश्वास करने लगेगा, वह पूर्ण विश्वास और निश्चितता तक पहुंच जाएगा कि इस ब्रह्मांड को ध्यान, इरादे तथा एक लक्ष्य के साथ बनाया गया है। इस तरह वह अंततः उस निष्कर्ष पर पहुंचेगा, जिसका इस्लाम आह्वान करता है कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं है।
''जिसने ऊपर-तले सात आकाश बनाए। तुम अत्यंत दयावान् की रचना में कोई असंगति नहीं देखोगे। फिर पुनः देखो, क्या तुम्हें कोई दरार दिखाई देता है? फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ। निगाह असफल होकर तुम्हारी ओर पलट आएगी और वह थकी हुई होगी।'' [127] [सूरा अल-मुल्क : 3,4]... More
नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिबब बिन हाशिम, अरब के क़बीला क़ुरैश से हैं, जो मक्का में रहता था। आप इस्माईल बिन इब्राहीम -उन दोनों पर अल्लाह की शांति हो- की नस्ल से थे।
जैसा कि ओल्ड टेस्टामेंट में उल्लेख किया गया है, अल्लाह ने इस्माईल को आशीर्वाद देने और उनके वंश से एक महान समुदाय को निकालने का वादा किया था।
"इस्माईल के विषय में मैंने तेरी सुन ली। देख, मैं उसको आशीष दूंगा, उसे प्रदान करूँगा, और बहुत बढ़ाऊंगा, बारह हाकिम, वह जनेगा, और मैं उससे एक बड़ी जाति बनाऊंगा।" [136] ओल्ड टेस्टामेंट, उत्पत्ति पुस्तक 17:20... More
मानव प्रौद्योगिकी ने एक ही क्षण में दुनिया के सभी हिस्सों में मानव आवाज और छवियों को पहुँचा दिया, तो क्या 1400 साल से अधिक पहले मानव जाति के सृष्टिकर्ता के लिए आत्मा और शरीर के साथ अपने पैगंबर को आसमान तक ले जाना संभव नहीं है? नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिस जानवर की सवारी की थी, उसका नाम बुराक़ है। बुराक़ एक लंबे और सफ़ेद जानवर का नाम है, जो गधे से बड़ा एवं खच्चर से छोटा होता है। जो (इतनी तेज़ छलांग लगाता है कि) अपनी दृष्टि की सीमा पर क़दम रखता है। उसकी एक लगाम एवं एक ज़ीन (काठी) होती है। अंबिया -उन सब पर अल्लाह की शांति हो- उसकी सवारी करते हैं। (यह बुख़ारी एवं मुस्लिम का वर्णन है)
''इसरा एवं मेराज'' का सफर अल्लाह की सम्पूर्ण क्षमता एवं उसके इरादे से हुआ है, जो हमारी सोच से ऊपर एवं हमारी जानकारी के सभी क़ानूनों से भिन्न है। यह सारे संसारों के रब की क़ुदरत के प्रमाणों एवं निशानियों में से एक है, क्योंकि उसी ने इन कानूनों को बनाया है।
हम सहीह बुख़ारी (जो हदीस की सबसे प्रामाणिक पुस्तक है) में रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के लिए आयशा -अल्लाह उनसे राज़ी हो- की गहरी मुहब्बत की बात पाते हैं और देखते हैं कि उन्होंने इस शादी की कभी शिकायत नहीं की।
आश्चर्य है कि उस समय रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के दुश्मनों ने आप पर सबसे घटिया आरोप लगाए। आपको कवि कहा, पागल कहा, परन्तु उन्होंने इस बाबत आपपर लांछन नहीं लगाया और न इसका किसी ने उल्लेख किया। मगर इस समय के कुछ स्वार्थी लोगों की तरफ से यह मुद्दा उठाया गया है। यह मामला या तो उन प्राकृतिक चीजों में से एक है, जो उस समय लोगों में आम थीं, जैसा कि छोटी उमर में बादशाहों की शादी की कहानियाँ हमें इतिहास के पन्नों में मिल जाती हैं। ईसाई धर्म में मरयम की उम्र का उदाहरण ले लें। ईसा के उनके गर्भ में आने से पूर्व लगभग नव्वे साल के एक पुरूष की तरफ से उन्हें शादी का पैग़ाम भेजा गया था। उस समय मरयम की उमर रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से आयशा की शादी के समय आइशा की की उम्र के आसपास ही थी। या 11वीं शताब्दी में इंग्लैंड की रानी इसाबेला की कहानी की ले लें, जिन्होंने आठ साल की उमर में शादी कर ली। इसके और भी दुसरे उदाहरण मौजद हैं। या फिर पैगंबर की शादी की कहानी वैसी नहीं है, जैसी कि लोग कल्पना करते हैं। क्या बनू कुरैज़ा के यहूदियों के हत्याकांड तथा लूटमार एवं हत्या आदि के दंड को अमानवीय न समझा जाए?
बनू कुरैज़ा के यहूदियों ने वचन तोड़ा था और मुसलमानों को ख़त्म करने के लिए बहुदेववादियों का साथ दिया था। चुनांचे उनके इस षडयंत्र ने उन्हीं को नष्ट कर दिया, जब उनको धोखे एवं वचन तोड़ने का प्रतिफल दिया गया। वह भी बिल्कुल उनकी शरीयत ही के अनुसार। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनको विकल्प दिया था कि वे अपने बारे में निर्णय लेने के लिए जिसको चाहें, चुन लें। चुनांचे उन्होंने आपके एक साथी को चुना था, जिन्होंने उनकी शरीयत के अनुसार किसास (बदले) का निर्णय दिया था। [153] [तारीख़-ए-इस्लाम : 2/307-318]
आज संयुक्त राष्ट्र के क़ानूनों में देशद्रोहियों और गदर करने वालों की सज़ा क्या है? केवल कल्पना कीजिए कि लोगों के एक समूह ने आपको तथा आपके पूरे परिवार को मार डालने और आपका धन छीन लेने का निश्चय कर लिया हो, तो आप उनके साथ क्या करेंगे? बनू कुरैज़ा के यहूदियों ने वचन तोड़ा और मुसलमानों को ख़त्म करने के लिए बहुदेववादियों के साथ खड़े हो गए। उस समय मुसलमानों को अपनी रक्षा के लिए क्या करना चाहिए था? मुसलमानों ने इस संबंध में जो किया, वह तर्कसम्मत था। उन्हें अपना बचाव करने का अधिकार था।
पहली आयत : ''धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। सत्य असत्य से स्पष्ट हो चुका है।'' [154] यह आयत एक महान इस्लामी नियम को स्थापित करती है। वह नियम यह है कि धर्म के मामले में ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है। जबकि दूसरी आयत है : ''उन लोगों से जिहाद करो, जो अल्लाह एवं आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते।'' [155] इस आयत का एक विशेष परिप्रेक्ष्य है। यह आयत उन लोगों के बारे में है, जो अल्लाह के रास्ते से रोकते हैं एवं दूसरों को इस्लाम स्वीकार करने से मना करते हैं। इस तरह देखें तो दोनों आयतों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। [सूरा अल-बक़रा : 256] [सूरा अल-तौबा : 29]
ईमान बन्दा एवं उसके रब के बीच के रिश्ते को कहते हैं। जिसने उसे काटना चाहा, उसका मामला अल्लाह के हवाले है। मगर जो इसका एलान करना चाहता है और इसे इस्लाम से लड़ने, उसके चेहरे को बिगाड़ने या उसके साथ विश्वासघात करने के ज़रिया के तौर पर लेना चाहता है, खुद मानव निर्मित जंगी क़ानूनों के अनुसार भी उसकी हत्या अनिवार्य है। इससे कोई असहमत नहीं है।
इस्लाम से फिर जाने की सज़ा के हवाले से संदेह की समस्या की जड़ संदेह करने वालों का यह मानना है कि सभी धर्म सही हैं। उनका मानना है कि सृष्टिकर्ता पर ईमान, एकमात्र उसी की इबादत करना एवं उसे हर दोष और कमी से पवित्र समझना, उसके अस्तित्व के इंकार और इस विश्वास के बराबर है कि वह मनुष्य या पत्थर के आकार में प्रकट होता है या उसकी औलाद है। जबकि अल्लाह इन सब चीज़ों से बहुत ऊँचा एवं पाक है। इस भ्रम का कारण कुछ लोगों का यह विश्वास है कि सभी धर्म सत्य पर हो सकते हैं। हालाँकि तर्क की वर्णमाला जानने वाले किसी भी व्यक्ति को यह बात हज़म नहीं हो सकती है। यह स्वतः स्पष्ट है कि ईमान नास्तिक्ता एवं कुफ्र का उल्टा है। इसलिए सही आस्था रखने वाला व्यक्ति पाता है कि सत्य को सापेक्ष कहना तार्किक लापरवाही और मूर्खता है। इस तरह, दो आपस में विरोधी आस्थाओं को सत्य मानना सही नहीं है।
इन तमाम तथ्यों के अलावा मुर्तद (इस्लाम से फिर जाने वाले) कभी भी सज़ा के हक़दार नहीं ठहरेंगे, यदि वे इसका (रिद्दत का) एलान न करें। वे इस बात को अच्छी तरह जानते भी हैं। परन्तु वे मुस्लिम समाज से माँग करते हैं कि वह बिना किसी रोक-टोक के उनके लिए अल्लाह एवं उसके रसूल के साथ उपहास का दरवाज़ा खोल दें, ताकि वे दूसरों को भी कुफ्र एवं अवज्ञा पर प्रोत्साहित कर सकें। उदाहरण स्वरूप कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनको पृथ्वी का कोई भी राजा अपने राज्य की भूमि पर स्वीकार नहीं करता है। मसलन यह कि उसकी प्रजा का कोई व्यक्ति राजा के अस्तित्व को नकारे, उसका या उसके किसी दल का उपहास करे या उसको ऐसे दोष से दोषित करे, जो राजा के तौर पर उसकी स्थिति के योग्य नहीं है। तो राजाओं के राजा के बारे में आप क्या कहोगे, जो हर चीज़ का निर्माता तथा मालिक है?... More
पैगंबर मूसा एक योद्ध थे और दाऊद भी एक योद्धा थे। मूसा और मुहम्मद ने, उन दोनों पर अल्लाह की शांति हो, राजनीतिक और सांसारिक मामलों की बागडोर संभाली और दोनों ने बुतपरस्त समुदाय से हिजरत की। मूसा -अलैहिस्सलाम- अपने समुदाय के साथ मिस्र से निकल गए और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यस़रिब (मदीना) की ओर प्रवास किया। इससे पहले भी आपके अनुयायियों ने हब्शा की ओर हिजरत की थी। ऐसा उन देशों के राजनीतिक और सैन्य प्रभाव से बचने के लिए किया गया था, जहां से वे अपने धर्म के साथ निकल गए थे। इसमें और मसीह -अलैहिस्सलाम- के आह्वान के बीच का अंतर यह था कि मसीह -अलैहिस्सलाम- का आह्वान गैर-बुतपरस्त लोगों के लिए था। अर्थात् यहूदियों के लिए। जबकि मूसा एवं मुहम्मद जिस माहौल (मिस्र तथा अरब) में काम कर रहे थे, वह बुतपरस्तों का था। इन दोनों जगहों की परिस्थितियाँ कहीं ज़्यादा मुश्किल थीं। मूसा एवं मुहम्मद -उन दोनों पर अल्लाह की शांति हो- के आह्वान से जिस बदलाव की आशा की जाती थी, वह एक आमूलचूल और व्यापक परिवर्तन था। बुतपरस्ती से एकेश्वरवाद की ओर एक विशाल परिवर्तन।
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय होने वाले युद्धों में मरने वालों की संख्या हज़ार से अधिक नहीं थी। वह भी अपने आपकी रक्षा करते हुए, आक्रामकता की प्रतिक्रिया में या धर्म की रक्षा में यह जानें गईं। जबकि दूसरे धर्मों में धर्म के नाम पर छेड़ी गई जंगों में मरने वालों की संख्या को देखते हैं, तो वह लाखों तक पहुँचती है।
इसी प्रकार मक्का विजय के दिन मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की दया स्पष्ट रूप से सामने आई, जब आपने कहा : आज रहम करने का दिना है। आपने क़ुरैश की व्यापक माफ़ी का ऐलान किया, जिस क़ुरैश ने मुसलमानों को कष्ट पहुँचाने में कोई कमी नहीं की थी। इस बुराई का बदला भलाई एवं बुरे व्यवहार का प्रतिफल अच्छा व्यवहार से दिया।... More
जिहाद का अर्थ है : गुनाहों से बचने के लिए अपनी आत्मा से लड़ना। गर्भावस्था का दर्द सहने के लिए गर्भावस्था में मां का संघर्ष भी जिहाद है। एक छात्र का पढ़ाई में मेहनत करना भी जिहाद है। अपने धन, सम्मान एवं धर्म की रक्षा की प्रयास भी जिहाद है। यहाँ तक कि इबादतों में धैर्य रखना जैसे कि रोज़ा रखना एवं समय पर नमाज़ पढ़ना भी जिहाद के प्रकारों में से माना जाता है।
मालूम हुआ कि जिहाद का अर्थ मासूम एवं संधि के साथ रहने वाले गैर-मुस्लिमों की हत्या करना नहीं है, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं।
इस्लाम जीवन का सम्मान करता है। उसकी नज़र में संधि के साथ रहने वाले लोगों और आम शहरियों को मारना सही नहीं है। इसी तरह युद्ध के समय भी संपत्तियों, बच्चों एवं महिलाओं की रक्षा करना वाजिब है। मारे जाने वालों की शक्लों को बिगाड़ना या उनका मुस़ला करना (हाथ, पैर, नाक, कान काटना या आँख फोड़ना) जायज़ नहीं है। यह इस्लामी चरित्र नहीं है।... More
यह अतार्किक है कि जीवन देने वाला, जिसे जीवन दिया गया है, उसे आदेश दे कि वह अपना या किसी निर्दोष का जीवन बिना किसी अपराध के ले ले। वह तो कहता है : ''अपने आपकी हत्या मत करो।'' [166] इसके अलावा और भी आयतें हैं, जो बिना किसी कारण, मसलन क़िसास एवं आत्म रक्षा आदि के, किसी की हत्या से रोकती हैं। केवल हूर प्राप्त करने की संकीर्ण सोच में जन्नत की नेमतों को सीमित नहीं करना चाहिए। जन्नत में ऐसी ऐसी नेमतें हैं, जिन्हें न किसी आँख ने देखा है, जिनके बारे न किसी कान ने सुना है और न जिनका ख़याल किसी मनुष्य के दिल में आया है। [सूरा अन-निसा : 29]
आज के युवाओं का आर्थिक परिस्थितियों से दोचार होना और उन भौतिक चीजों को प्राप्त करने में असमर्थ होना, जो उन्हें शादी करने में मदद करें, उन्हें इन घृणित कृत्यों के प्रचारकों के लिए आसान शिकार बना देता है। खासतौर पर किसी लत के शिकार और मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोग। यदि इन घृणित कृत्यों के प्रचारक सच्चे होते, तो नौजवानों को इस मिशन पर भेजने से पहले खुद अपने आपसे इसकी शुरूआत करते।
शब्द सैफ़ (तलवार) पवित्र क़ुरआन में एक बार भी नहीं आया है। वो देश जहाँ इस्लामी इतिहास ने जंगें नहीं देखीं, वहीं आज दुनिया के अधिकांश मुसलमान रहते हैं। उदाहरण के तौर पर इंडोनेशिया, भारत और चीन आदि को ले सकते हैं। इस्लाम के तलवार के ज़ोर से न फैलने का प्रमाण मुसलमानों द्वारा जीते गए देशों में आज तक ईसाइयों, हिंदुओं और अन्य लोगों का मौजूद रहना है। जबकि जिन देशों पर गैर-मुस्लिमों ने विनाशकारी युद्धों के द्वारा क़ब्जा किया और लोगों को ज़बरदस्ती अपना धर्म अपनाने पर मजबूर किया, उनमें मुसलमानों की संख्या बहुत कम है। आप सलीबी जंगों का इतिहास उठाकर देख सकते हैं।
जिनेवा विश्वविद्यालय के डाइरेक्टर एडौर्ड मोंटे ने एक व्याख्यान में कहा है : ''इस्लाम एक तेजी से फैलने वाला धर्म है, जो संगठित केंद्रों द्वारा दिए गए प्रोत्साहन के बिना अपने आप फैल रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हर मुसलमान स्वभाव से एक मिशनरी है। एक मुसलमान विश्वास में मजबूत होता है और उसके विश्वास की तीव्रता उसके दिल और दिमाग पर हावी हो जाती है। इस्लाम का यह गुण किसी और धर्म में नहीं है। इस कारण से, आप देखते हैं कि ईमान के जोश से भरपूर मुसलमान जहाँ भी जाता है और जहाँ भी रुकता है, अपने धर्म का प्रचार करता है। वह जिस बुतपरस्त से भी मिलता है, उस तक ईमान का मज़बूत वायरस ट्रान्सफर कर देता है। आस्था के अलावा, इस्लाम सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल है। इस्लाम के पास माहौल के अनुकूलन होने और इस मजबूत धर्म की आवश्यकता के अनुसार माहौल को अनुकूलित करने की अद्भुत क्षमता है।'' ''अल-हदीक़ह मजमुअह अदब बारिअ व हिकमह बलीग़ह'', सुलैमान बिन सालेह अल-ख़राशी
मुसलमान नेक लोगों और रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों के मार्ग पर चलते हैं, उनसे मुहब्बत करते हैं, उन्हीं ही तरह नेक बनने की कोशिश करते हैं और उन लोगों की तरह ही एक अल्लाह की इबादत करते हैं। परन्तु वे उनको पवित्र नहीं मानते हैं और न ही अपने एवं अल्लाह के बीच उनमें से किसी को मध्यस्थ बनाते हैं।
''तथा हममें से कोई किसी को अल्लाह के सिवा रब न बनाए।'' [168] [सूरा आल-ए-इमरान : 64]
मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- न सुन्नी थे और न शिया। आप शुद्ध मुस्लिम थे। इसी तरह ईसा -अलैहिस्सलाम- न कैथोलिक थे और न और कुछ। दोनों बिना मध्यस्थ के एक अल्लाह के बन्दे थे। ईसा ने स्वयं की इबादत की और न अपनी माँ की। इसी तरह न मुहम्मद ने अपने आपकी इबादत की और न अपनी बेटी की, न दामाद की।
राजनैतिक समस्याओं, सत्य धर्म से दूरी या दूसरे कारणों से इतने सारे गुट प्रकट हो गए हैं। इनका सरल, स्पष्ट एवं सत्य धर्म के साथ कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल, शुब्द ''सुन्नत'' का अर्थ पूरी तरह से पैगंबर की कार्यप्रणाली का पालन करना है। जबकि शब्द ''शिया'' लोगों का एक गुट है, जो आम मुसलमानों के मार्ग से अलग हो गए हैं। इस तरह, सुन्नी वो हैं जो रसूल की कार्यप्रणाली का पालन करते हैं और वही सामान्य रूप से सही दृष्टिकोण का पालन करते हैं, जबकि शिया एक संप्रदाय हैं, जो इस्लाम के सही दृष्टिकोण से भटक गया है।
''जिन लोगों ने अपने धर्म में विभेद किया और कई समुदाय हो गये, (हे नबी!) आपका उनसे कोई संबंध नहीं, उनका निर्णय अल्लाह को करना है, फिर वह उन्हें बताएगा कि वे क्या कर रहे थे।'' [169] [सूरा अल-अनआम : 159]... More
इमाम का अर्थ वह व्यक्ति है, जो लोगों को नमाज़ पढ़ाए, उनकी देख-भाल करे या उनका नेतृत्व करे। यह कुछ खास लोगों तक सीमित धार्मिक पद नहीं है। इस्लाम में कोई जातिवाद या पुरोहितवाद नहीं है। इस्लाम धर्म सभी के लिए है। लोग अल्लाह के सामने कंघे के दांतों की तरह समान हैं। एक अरब या एक गैर-अरब के बीच कोई अंतर नहीं है। अगर है भी तो धर्मपरायणता और अच्छे कामों की बुनियाद पर। नमाज़ पढ़ाने का सबसे ज़्यादा हक़दार वह व्यक्ति है, जिसे कुरआन ज्यादा और अच्छा याद हो और जो नमाज़ से संबंधित नियमों को सबसे अधिक जानने वाला है। मुसलमानों के निकट इमाम का जो भी महत्व हो, वह किसी भी स्थिति में स्वीकारोक्ति नहीं सुनता है और पापों को क्षमा नहीं करता है, जैसा कि पादरी की स्थिति है।
''उन्होंने अपने विद्वानों और धर्माचारियों (संतों) को अल्लाह के सिवा पूज्य बना लिया तथा मरयम के पुत्र मसीह को, जबकि उन्हें जो आदेश दिया गया था, वह इसके सिवा कुछ न था कि एक अल्लाह की इबादत (वंदना) करें। कोई पूज्य नहीं है, परन्तु वही। वह उससे पवित्र है, जिसे उसका साझी बना रहे हैं।'' [170] [सूरा अल-तौबा : 31]
इस्लाम इस बात की पुष्टि करता है कि नबी अल्लाह का जो संदेश पहुँचते हैं, उसमें उनसे कोई त्रुटि नहीं होती। जबकि कोई पुजारी या संत न तो ग़लती से पाक होता है और न उसके पास वह्य आती है। इस्लाम में गैर-अल्लाह से मदद माँगने के लिए उसकी शरण में जाना बिल्कुल हराम है। चाहे यह मदद नबियों ही से क्यों न माँगी जाए। जिसके हाथ में कुछ नहीं है, वह दूसरे को कुछ दे नहीं सकता है। इंसान अल्लाह के अलावा किसी दूसरे से कैसे मदद माँग सकता है, जबकि वह दूसरा अपने आपकी मदद नहीं कर सकता है। अल्लाह से माँगना सम्मान है, जबकि उसके अलावा किसी और से माँगना अपमान है। क्या राजा एवं प्रजा के बीच माँगने में बराबरी करना तार्किक है। तर्क और बुद्धि इस विचार का पूरी तरह से खंडन करती है। पूज्य के अस्तित्व एवं उसके हर चीज़ पर सामर्थ्य होने के ईमान के साथ गैर-अल्लाह से माँगना फ़िजूल है, शिर्क है, इस्लाम के विरूद्ध है और सबसे बड़ा पाप है।... More
नबी वह है जिसकी ओर वह्य (प्रकाशन) भेजी जाती है, परन्तु वह कोई नया संदेश या कार्यप्रणाली लेकर नहीं आता, जबकि रसूल वह है जिसे अल्लाह, उसके समुदाय के अनुरूप नई कार्यप्रणाली एवं शरीयत देकर भेजता है। उदाहरण स्वरूप, तौरात मूसा -अलैहिस्सलाम- पर, इंजील ईसा -अलैहिस्सलाम- पर, ज़बूर दाऊद -अलैहिस्सलाम- पर, स़हीफ़े इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- पर तथा क़ुरआन मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर उतरे।
मानव के लिए जो उपयुक्त हो सकता है, वह उन्हीं की तरह मानव ही हो सकता है, जो उन्हीं की भाषा में उनसे बात करे और उनके लिए आदर्श हो। यदि उनकी ओर किसी फ़रिश्ते को रसूल बनाकर भेज जाता और वह कोई मुश्किल काम करता, तो लोग कहते कि फ़रिश्ता जो कर सकता है, हम कर नहीं सकते।
''(हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिंत होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते।'' [174] [सूरा अल-इसरा : 95]
''और यदि हम उसे फ़रिश्ता बनाते, तो निश्चय उसे आदमी (के रूप में) बनाते और अवश्य उनपर वही संदेह डाल देते, जिस संदेह में वे (अब) पड़े हुए हैं।" [175] [सूरा अल-अन्आम : 9]... More
वह्य के माध्यम से सृष्टिकर्ता के सृष्टि से संबंध साधने के कुछ प्रमाणों इस प्रकार हैं :
1- हिकमत (तत्वज्ञान) : मिसाल के तौर पर देखें कि जब इंसान कोई घर बनाता है और फिर उससे खुद फ़ायदा उठाए बिना या अपनी औलाद या किसी और को फ़ायदा उठाने दिए बिना यूँ ही छोड़ देता है,तो स्वभाविक रूप से हम उसे अविवेकी या नासमझ कहते हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि ब्रह्मांड को बनाने और आकाशों और धरती के बीच की सारी चीज़ों को मनुष्य के लिए उपयोगी बनाने की कोई न कोई हिकमत एवं उद्देश्य ज़रूर है।
2- प्रकृति या स्वभाव : मानव मानस के भीतर अपनी उत्पत्ति, अपने अस्तित्व के स्रोत और अपने अस्तित्व के उद्देश्य को जानने के लिए एक मजबूत जन्मजात प्रेरणा होती है। मानव प्रकृति हमेशा उसे उस शक्ति की खोज करने के लिए प्रेरित करती है, जिसने उसे अस्तित्व प्रदान किया है। मगर इंसान अकेला अपने सृष्टिकर्ता के गुणों, अपने अस्तित्व के उद्देश्य एवं अपने अंजाम की खोज नहीं कर सकता है। इसके लिए एक ग़ैबी शक्ति के हस्तक्षेप की ज़रूरत होती है, जो यह काम रसूलों को भेजकर करती है और हमारे लिए जीवन के राज़ों को खोलती है।... More
मानव पिता आदम -अलैहिस्सलाम- के वर्जित पेड़ से खा लेने के कारण, उनकी तौबा स्वीकार करने के समय अल्लाह ने जो मानव को पाठ पढ़ाया, वह सारे संसारों के रब के द्वारा मानव को क्षमा करने का पहला उदाहरण था। चूँकि आदम से विरासत में मिले पाप का कोई अर्थ नहीं है, जैसा कि ईसाइ मानते हैं, इसलिए कोई किसी के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा। हर व्यक्ति अपने गुनाह का बोझ अकेला उठाएगा। यह हमपर अल्लाह की एक दया है कि इंसान गुनाहों से पाक-साफ़ होकर पैदा होता है और वह वयस्क होने के बाद से ही अपने कर्मों का स्वयं ज़िम्मेदार है।
इंसान से उस गुनाह का हिसाब ही नहीं लिया जाएगा, जिसको उसने किया ही नहीं। इसी प्रकार वह अपने ईमान एवं अच्छे कार्य के कारण ही मुक्ति पाएगा। अल्लाह ने इंसान को जीवन दिया तथा उसे आज़माने एवं उसकी परीक्षा लेने के लिए उसे इरादा दिया। वह केवल अपने कर्मों का ज़िम्मेवार है।
अल्लाह तआला ने कहा है :... More
अल्लाह जो सारे संसार का सृष्टिकर्ता है, ज़िन्दा तथा नित्य स्थायी है। बेनियाज़ एवं सक्षम है। उसे मानवता के लिए मसीह का रूप धारण करके सूली पर चढ़कर जान देने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि ईसाई मानते हैं। वही जीवन देता है एवं वही जीवन लेता भी है। इसलिए वह मरा नहीं है और इसी तरह वह किसी का रूप धारण करके दुनिया में आया भी नहीं था। उसने ईसा मसीह -अलैहिस्सलाम- को हत्या एवं सूली पर चढ़ाए जाने से बचाया, जिस प्रकार उसने इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- को आग से बचाया था, मूसा -अलैहिस्सलाम- को फ़िरऔन एवं उसकी फ़ौज से बचाया था और जिस प्रकार वह हमेशा अपने नेक बन्दों की सुरक्षा और हिफ़ाज़त करता आया है।
''तथा उनके (गर्व से) यह कहने के कारण कि निःसंदेह हमने ही अल्लाह के रसूल मरयम के पुत्र ईसा मसीह को क़त्ल किया। हालाँकि न उन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि उनके लिए (किसी को मसीह का) सदृश बना दिया गया। निःसंदेह जिन लोगों ने इस मामले में मतभेद किया, निश्चय वे इसके संबंध में बड़े संदेह में हैं। उन्हें इसके संबंध में अनुमान का पालन करने के सिवा कोई ज्ञान नहीं, और उन्होंने उसे निश्चित रूप से क़त्ल नहीं किया। बल्कि अल्लाह ने उसे अपनी ओर उठा लिया तथा अल्लाह सदा से हर चीज़ पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।'' [178] [सूरा अल-निसा : 157-158]
एक मुसलमान पति अपनी ईसाई या यहूदी पत्नी के मौलिक धर्म, उसकी धार्मिक पुस्तक एवं उसके रसूल का सम्मान करता है। बल्कि उसका ईमान इसके बग़ैर पूरा ही नहीं होता है। वह उसे अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। जबकि इसके विपरीत बात सत्य नहीं है। यहूदी या ईसाई जब इस बात का विश्वास रखेंगे कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई माबूद नहीं है एवं मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के रसूल हैं, हम अपनी बेटियों की शादी उनसे कर देंगे।
इस्लाम अक़ीदे में वृद्धि करता और उसे पूर्णता प्रदान करता है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई मुसलमान ईसाई धर्म अपनाना चाहे, तो उसके लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एवं क़ुरआन पर अपने ईमान को खो दे, साथ ही ट्रिनिटी में विश्वास रखे और पादरियों तथा अन्य लोगों का सहारा लेने के कारण सारे संसारों के रब के साथ सीधे संबंध को भी खो दे। और यदि यहूदी धर्म ग्रहण करना चाहे, तो उसके लिए ज़रूरी होगा कि वह मसीह -अलैहिस्सलाम- एवं सही इंजील पर विश्वास न रखे। हालाँकि किसी के पास यहूदी धर्म अपनाने का अवसर ही नहीं है। क्योंकि यह कोई वैश्विक धर्म नहीं, बल्कि एक जाति विशेष का धर्म है। इसमें सांप्रदायिक संकीर्णता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इस्लामी सभ्यता ने अपने सृष्टिकर्ता के साथ अच्छा व्यवहार किया है और सृष्टिकर्ता और उसकी सृष्टि के बीच के संबंध को सही जगह पर रखा है। जबकि अन्य मानव सभ्यताओं ने अल्लाह के साथ अच्छा मामला नहीं किया है। उन्होंने उसका इंकार किया है, ईमान एवं इबादत में दूसरे प्राणियों को उसके साथ साझी बनाया है और उसे ऐसे स्थान पर रखा है, जो उसकी शान एवं सामर्थ्य के अनुरूप नहीं है।
एक सच्चा मुसलमान सभ्यता एवं संस्कृति के बीच मिश्रण नहीं करता है। वह विचारों और विज्ञानों से डील करने के तरीक़े को निर्धारित करने एवं उनके बीच अंतर करने में बीच का रास्ता चुनता है।
सांस्कृतिक तत्व : विश्वास संबंधी, वैचारिक तथा बौद्धिक बातों और व्यवहारिक और नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है।... More
धर्म अच्छे आचरण और बुरे कर्मों से बचने का आह्वान करता है। इस प्रकार, कुछ मुसलमानों का बुरा व्यवहार उनकी सांस्कृतिक आदतों या उनके धर्म की अज्ञानता और सच्चे धर्म से उनकी दूरी के कारण होता है।
इसलिए कोई विरोधाभास नहीं है। क्या लक्ज़री कार चालक का सही ड्राइविंग के नियमों से अज्ञानता के कारण किसी भयानक दुर्घटना का शिकार हो जाना, उस कार की श्रेष्ठता की वास्तविकता का खंडन करता है?
पश्चिमी अनुभव मध्य युग में लोगों की क्षमताओं और दिमागों पर चर्च और राज्य के प्रभुत्व और गठबंधन की प्रतिक्रिया के रूप में आया। इस्लामिक व्यवस्था की व्यवहारिकता और तर्क को देखते हुए इस्लामी जगत ने कभी भी इस समस्या का सामना नहीं किया है।
वास्तव में, हमें एक दृढ़ दिव्य नियम की आवश्यकता है, जो मनुष्य के लिए उसकी सभी स्थितियों में उपयुक्त हो। हमें ऐसे संदर्भों की आवश्यकता नहीं है, जो मानवीय ख़्वाहिशों, इच्छाओं और मिजाज के अनुसार हों! जैसा कि सूदखोरी, समलैंगिकता और अन्य चीज़ों को वैध ठहराने में होता है। इसी तरह हमें ऐसे संदर्भों की भी आवश्यकता नहीं है, जो ताक़तवरों की तरफ से लिखे जाएं, ताकि कमज़ोरों के लिए बोझ बन जाएं, जैसा कि पूंजीवादी व्यवस्था में होता है। हमें साम्यवाद भी नहीं चाहिए, जो संपत्ति के मालिक होने की इच्छा की प्रकृति का विरोध करता है।
मुसलमानों के पास लोकतंत्र से बेहतर व्यवस्था है, जिसे शूरा व्यवस्था (विचार विमर्श पर आधारित व्यवस्था) कहते हैं।
लोकतंत्र : उदाहरण के तौर पर परिवार के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय, जब आप राय देने वाले व्यक्ति के अनुभव, उम्र या ज्ञान की परवाह किए बिना अपने परिवार के सभी सदस्यों की राय को ध्यान में रखते हैं और मकतब के बच्चे से लेकर बुद्धिमान दादाजी तक सभी की राय को समान मानते हैं, इसे लोकतंत्र कहा जाता है।
शूरा व्यवस्था (विचार विमर्श पर आधारित व्यवस्था) : यह बड़ी उम्र, बड़े स्थान एवं अनुभव वाले से इस बात पर मश्वरा करना है कि क्या सही है और क्या गलत?... More
पृथ्वी पर उपद्रव का इरादा रखने वालों को रोकने और दंडित करने के लिए सीमाएँ निर्धारित की गई हैं। इसकी दलील यह है कि भूख और अत्यधिक आवश्यकता के कारण चोरी करने या ग़लती से हत्या करने के मामलों में इसे लागू नहीं किया जाता। हुदूद नाबालिग, पागल या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति पर लागू नहीं होती हैं। यह मुख्य रूप से समाज की रक्षा के लिए हैं। जहाँ तक इसके सख़्त होने की बात है, तो यह भी समाज के हित में है। इससे समाज के लोगों को ख़ुश होना चाहिए। इन (दंडों) का अस्तित्व लोगों के लिए रहमत है, जिससे उनको सुरक्षा प्राप्त होती है। केवल अपराधी, डाकू और भ्रष्ट लोग ही इन दंडों पर आपत्ति करेंगे, क्योंकि उनको अपनी जान का ख़तरा है। इनमें से कुछ हुदूद तो मानव निर्मित क़ानूनों में भी मौजूद हैं, जैसा कि मृत्यु दंड इत्यादि।
जो लोग इन दंडों के बारे में बुरा-भला कहते हैं, वे अपराधी के हित के बारे में सोचते हैं और समाज के हित को भूल जाते हैं। वे अपराधी पर दया करते हैं और पीड़ित की उपेक्षा करते हैं। वे सज़ा को कठोर कहते हैं और अपराध की गंभीरता की उपेक्षा करते हैं।
यदि वे दंड के साथ अपराध की तुलना करें, तो इन शर्ई दंडों में न्याय पर आधारित पाएंगे एवं उनको इन दंडों का अपराधों के समान होने का यक़ीन हो जाएगा। उदाहरण स्वरूप, यदि चोर के काम को देखें, वह अंधेरे में छुप-छुपाकर चलता है, ताला तोड़ता है, हथियार लहराता है और अमन से रह रहे लोगों को डराता है। वह घरों के सम्मान को पामाल करता है, जो मुक़ाबला करता है उसकी हत्या करने पर उतर आता है और अधिकांश समय में हत्या का अपराध कर डालता है, ताकि अपनी चोरी पूरी कर सके एवं उसके बाद आराम से भाग सके। वह बिना किसी अंतर के हत्या करता है। जब हम चोर के इन काले करतूतों पर विचार करते हैं, तो शरीयत के दंडों की सख़्ती में छुपी मसलहत को जान जाते हैं।... More
इस्लाम का एक सामान्य नियम यह है कि सभी प्रकार के धन अल्लाह के हैं और लोग इसके प्रभारी मात्र हैं और धन को केवल अमीरों के बीच घूमते रहना नहीं चाहिए। इस्लाम ने ज़कात के रास्ते से फ़क़ीरों एवं मिस्कीनों के लिए एक तय प्रतिशत ख़र्च किए बिना धन इकट्ठा करने से मना किया है। ज़कात एक इबादत है जो इंसान को ख़र्च करने एवं देने के गुणों को अपनाने तथा कंजूसी एवं बखीली की भावनाओं से दूर रहने में मदद करती है।
''अल्लाह ने जो कुछ भी इन बस्तियों वालों (के धन) से अपने रसूल पर लौटाया, तो वह अल्लाह के लिए और रसूल के लिए और (रसूल के) रिश्तेदारों, अनाथों, निर्धनों तथा यात्री के लिए है; ताकि वह (धन) तुम्हारे धनवानों ही के बीच चक्कर लगाता न रह जाए, और रसूल तुम्हें जो कुछ दें, उसे ले लो और जिस चीज़ से रोक दें, उससे रुक जाओ। तथा अल्लाह से डरते रहो। निश्चय अल्लाह बहुत कड़ी यातना देने वाला है।'' [184] [सूरा अल-हश्र : 7]
''अल्लाह तथा उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसमें से खर्च करो जिसमें उसने तुम्हें उत्तराधिकारी बनाया है। फिर तुममें से जो लोग ईमान लाए और उन्होंने ख़र्च किए, उनके लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।'' [185] [सूरा अल-हदीद : 7]... More
उदाहरण के तौर पर इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था और पूंजीवाद तथा समाजवाद के बीच एक सरल तुलना से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम ने यह संतुलन कैसे सुनिश्चित किया है।
स्वामित्व की स्वतंत्रता के संबंध में :
पूंजीवाद में : निजी संपत्ति ही सामान्य सिद्धांत है।... More
अतिवाद, कठोरता और असहिष्णुता यह ऐसे गुण हैं, जिनसे सच्चे धर्म ने मूल रूप से मना किया है। पवित्र क़ुरआन ने कई आयतों में व्यवहार में दया और करुणा को अपनाने और क्षमा और सहिष्णुता के सिद्धांत पर चलने का आह्वान किया है।
''अल्लाह की दया के कारण (ऐ नबी!) आप उनके लिए सरल स्वभाव के हैं। और यदि आप प्रखर स्वभाव और कठोर हृदय के होते, तो वे आपके पास से छट जाते। अतः आप उन्हें माफ़ कर दें और उनके लिए क्षमा याचना करें। तथा उनसे मामलों में परामर्श करें। फिर जब आप दृढ़ संकल्प कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें। निःसंदेह अल्लाह भरोसा करने वालों को पसंद करता है।'' [194] [सूरा आल-ए-इमरान : 159]
''(ऐ नबी!) आप उन्हें अपने पालनहार के मार्ग (इस्लाम) की ओर हिकमत तथा सदुपदेश के साथ बुलाएँ और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करें, जो सबसे उत्तम है। निःसंदेह आपका पालनहार उसे सबसे अधिक जानने वाला है, जो उसके मार्ग से भटक गया और वही सीधे मार्ग पर चलने वालों को भी अधिक जानने वाला है।'' [195] [सूरा अल-नह़्ल : 125]... More
धर्म मूल रूप से लोगों को उनके द्वारा खुद पर लगाए गए कई प्रतिबंधों से राहत दिलाने के लिए आता है। उदाहरण स्वरूप, इस्लाम से पूर्व जाहिलियत के समय कई घिनौनी प्रथाएँ फैल गई थीं, जैसे लड़कियों को ज़िंदा दफ़न कर देना, कुछ प्रकार के खानों को मर्दों के लिए हलाल एवं औरतों के लिए हराम कर देना, औरतों को विरासत से महरूम कर देना, इसी तरह मुरदार खाना, व्यभिचार, शराब पीना, यतीम का माल खाना और सूदखोरी आदि दूसरे ग़लत कार्य।
लोगों के धर्म से विमुख होने और भौतिक विज्ञान को ही अपना लेने का एक प्रमुख कारण कुछ लोगों के यहाँ कुछ धार्मिक अवधारणाओं में अंतर्विरोधों का पाया जाना है। इसलिए, जो कारण तथा विषेशताएँ लोगों को सही धर्म अपनाने के लिए आमंत्रित करती हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण उसका संतुलित होना है और यह बात हम इस्लाम धर्म में स्पष्ट रूप से पाते हैं।
अन्य धर्मों की समस्या, जो एक सच्चे धर्म की विकृति से उत्पन्न हुई है :... More
"ऐ नबी! अपनी पत्नियों, अपनी बेटियों और ईमान वाले लोगों की स्त्रियों से कह दें कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें डाल लिया करें। यह इसके अधिक निकट है कि वे पहचान ली जाएँ, फिर उन्हें कष्ट न पहुँचाया जाए। और अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [205] [सूरा अल-अहज़ाब : 59]
मुस्लिम महिला विशिष्टता शब्द के अर्थ को अच्छी तरह समझती है। जब वह अपने बाप, भाई, बेटा एवं पति से प्यार करती है, तो समझती है कि उनमें से हर एक के साथ प्यार की एक विशिष्टता है। अपने पति, अपने पिता या अपने भाई से उसकी मोहब्बत उनमें से हर एक को उसका अधिकार देने की माँग करती है। उसके पिता का उसपर अधिकार है कि उसका सम्मान हो, भलाई के साथ पेश आया जाए, इसी तरह उसके बेटे का उसपर हक़ है कि उसकी देख-भाल हो एवं शिक्षा दी जाए। वह अच्छी तरह समझती है कि कब, कैसे और किसके सामने अपनी शोभा ज़ाहिर करनी है। वह किसी अजनबी के साथ मिलते समय उस तरह का कपड़ा नहीं पहनती, जिस तरह का कपड़ा किसी क़रीबी के साथ मिलते समय पहनती है। वह एक ही हालत में सबके सामाने नहीं आती। मुसलमान महिला एक स्वतंत्र महिला है। उसने दूसरों की ख़्वाहिश और फैशन के सामने बंदी बनने से इनकार कर दिया है। वह, उस तरह कपड़ा पहनती है जो उसके लिए उचित हो, जो उसे ख़ुशी प्रदान करे और उसके सृष्टिकर्ता को राज़ी करे। देखिए, कैसे पश्चिम में महिलाएँ फैशन और फैशन हाउसों की गुलाम बन गई हैं। यदि उनसे कहा जाए कि इस साल का फैशन छोटी, टाइट पैंट पहनने का है, तो महिलाएँ उसे पहनने के लिए दौड़ पड़ती हैं और यह नहीं देखती हैं कि यह उनके लिए फिट है या उसे पहनने में उन्हें आराम महसूस होता है या नहीं।
आज महिलाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, जब उन्हें एक वस्तु बना दिया गया है। लगभग हर विज्ञापन या प्रकाशन में नग्न महिला की तस्वीर होती है, जो पश्चिमी महिलाओं को इस युग में उनके मूल्य का एक अप्रत्यक्ष संदेश देता है। मुस्लिम महिला का अपनी ख़ूबसूरती को छुपाना, यह पूरी दुनिया को एक संदेश है कि वह बहुमूल्य इंसान और अल्लाह की ओर से सम्मानीय है। जो उससे बरताव करना चाहे उसके लिए अनिवार्य है कि वह उसके ज्ञान, सभ्यता, उसके दृढ़ विश्वास और विचार को देखकर निर्णय ले, न कि उसके जिस्म की ख़ूबसूरती को देखकर।... More
यदि सर ढ़ाँपना पिछड़ापन है तो क्या आदम -अलैहिस्सलाम- के पीछे भी कोई युग है? जबसे अल्लाह ने आदम -अलैहिस्सलाम- एवं उनकी पत्नी को पैदा किया और उन्हें जन्नत में जगह दी, उसी समय से उनके लिए पर्दा एवं लिबास उपलब्ध कराया है।
''निःसंदेह तुम्हारे लिए यह है कि तुम इसमें न भूखे होगे और न नग्न होगे।'' [206] [सूरा ताहा: 118]
इसी प्रकार अल्लाह ने आदम की संतान के लिए लिबास उतारा, ताकि वे उससे पर्दा करें एवं शोभा एख़्तियार करें। उसी समय से मनुष्य अपने लिबास को विकसित करता रहा। जातियों के विकास को कपड़ों और पर्दे के विकास से मापा जाता है। यह ज्ञात है कि सभ्यता से अलग-थलग रहने वाले लोग, जैसे कि कुछ अफ्रीकी जाति, गुप्त अंग को ढकने के अलावा कुछ नहीं पहनते हैं।... More
पुरुषों और महिलाओं के बीच शारीरिक संरचना में अंतर है, इस बात पर दुनिया एकमत है। इसका एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि पुरुषों की तैराकी के कपड़े पश्चिम में महिलाओं के कपड़ों से अलग हैं। फ़ितना को दूर करने के लिए महिला अपना पूरा शरीर ढाँपती है। क्या किसी ने कभी किसी महिला के किसी पुरुष का बलात्कार करने की घटना सुनी है? पश्चिम में महिलाएं उत्पीड़न या बलात्कार से सुरक्षित जीवन के अपने अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शनों में भाग लेती रहती हैं, जबकि हमने पुरुषों द्वारा इस तरह के प्रदर्शनों के बारे में कभी नहीं सुना है।
मुस्लिम महिलाएं न्याय चाहती हैं, समानता नहीं। पुरुषों के साथ समानता से वह अपने कई अधिकारों और विशेषताओं को खो देंगी। मान लीजिए किसी व्यक्ति के दो पुत्र हैं। उनमें से एक की उम्र पांच साल और दूसरे की उम्र अठारह साल है। वह व्यक्ति दोनों के लिए एक-एक शर्ट खरीदना चाहता है। अब यहाँ समानता उसी स्थिति में प्राप्त होगी जब दोनों शर्ट एक ही माप की खरीदी जाए, जो दोनों के लिए परेशानी का कारण बनेगा। लेकिन न्याय यह है कि उनमें से प्रत्येक के लिए उचित माप की शर्ट खरीदी जाए। इस प्रकार दोनों खुश हो जाएँगे।
इस समय महिलाएं यह साबित करने की कोशिश कर रही हैं कि वे वह सब कुछ कर सकती हैं जो एक पुरुष कर सकता है। जबकि, वास्तव में महिलाएं इस स्थिति में अपनी विशिष्टता और विशेषाधिकार दोनों खो देती हैं। अल्लाह ने उन्हें वह करने के लिए बनाया है, जो कोई पुरुष नहीं कर सकता है। यह साबित हो चुका है कि प्रसव और प्रसव पीड़ा सबसे गंभीर पीड़ाओं में से एक है। इस परेशानी के बदले धर्म महिलाओं को आवश्यक सम्मान देने आया है। उसे गुजारा भत्ता और काम की ज़िम्मेदारी न लेने का अधिकार देता है, यहां तक कि उसके पति को यह अधिकार नहीं कि पत्नी के निजी धन में अपना हिस्सा तक लगाए, जैसा कि पश्चिम में करते हैं। दूसरी तरफ़ अल्लाह ने आदमी को बच्चे के जन्म के दर्द को सहन करने की ताकत नहीं दी है। लेकिन, उदाहरण के तौर पर उसने उसे पहाड़ों पर चढ़ने की क्षमता दी है।
अगर एक महिला को पहाड़ों पर चढ़ना, काम करना और मेहनत करना पसंद हो और वह दावा करती हो कि वह एक पुरुष की तरह ही ऐसा कर सकती है, तो वह ऐसा करती तो है, लेकिन अंत में, उसी को बच्चों को जन्म भी देना होगा, उनकी देख-भाल भी करनी होगी एवं उन्हें दूध भी पिलाना होगा। क्योंकि मर्द यह काम किसी भी स्थिति में नहीं कर सकता है। यह औरत पर दोहरा बोझ होगा, जिससे वह बच सकती थी।... More
वैश्विक आँकड़ों के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं का जन्म लगभग समान दर से होता है। यह वैज्ञानिक रूप से ज्ञात है कि महिला बच्चों के बचने और जीवित रहने की संभावना लड़कों की तुलना में अधिक होती है। युद्धों में पुरुषों की हत्या का प्रतिशत महिलाओं की तुलना में अधिक होता है। इसी तरह यह भी वैज्ञानिक रूप से ज्ञात है कि महिलाओं का औसत जीवनकाल पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। नतीजतन, दुनिया में महिला विधवाओं का प्रतिशत पुरुष विधवाओं की तुलना में अधिक है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विश्व में स्त्रियों की जनसंख्या पुरुषों की जनसंख्या से अधिक है। तदनुसार, प्रत्येक पुरुष को एक पत्नी तक सीमित रखना व्यवहारिक दृष्टि से उचित नहीं हो सकता है।
ऐसे समाजों में, जहां बहुविवाह कानूनी रूप से प्रतिबंधित है, पुरुषों के लिए पत्नी के अतिरिक्त कई प्रेमिकाएं और विवाहेतर संबंध होना आम बात है। यह बहुविवाह की एक अंतर्निहित स्वीकृति है, लेकिन यह उनके यहाँ अवैध है। इस्लाम से पहले यही स्थिति आम थी। इस्लाम इसे ठीक करने, महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करने और उन्हें एक प्रेमिका से एक ऐसी पत्नी में बदलने के लिए आया है, जिसके पास अपने और अपने बच्चों के लिए गरिमा और अधिकार हों।
आश्चर्यजनक रूप से, इन समाजों को गैर-विवाहित संबंधों या समलैंगिक विवाहों को स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं है। साथ ही स्पष्ट जिम्मेदारी के बिना स्थापित रिश्तों को स्वीकार करने या यहां तक कि बिना पिता के बच्चों को स्वीकार करने में भी कोई परेशानी नहीं है। परन्तु, यह एक पुरुष और एक से अधिक महिलाओं के बीच क़ानूनी विवाह को बर्दाश्त नहीं करते हैं। दूसरी तरफ़ इस्लाम इस मामले में बुद्धिमान है। वह महिलाओं की गरिमा और अधिकारों को बनाए रखने के लिए पुरुष को कई पत्नियां रखने की अनुमति देता है, जब तक उसकी चार से कम पत्नियाँ हों और न्याय और क्षमता की शर्त पाई जाए। उसने यह अनुमति उन महिलाओं की समस्या को हल करने के लिए दी है, जो एक अविवाहित पति नहीं पाती हैं और उनके पास विवाहित पुरुष से शादी करने या रखैल बनने के लिए मजबूर होने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।... More
एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु जिसे आधुनिक समाज में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, वह अधिकार है, जो इस्लाम ने महिलाओं को दिया है और पुरुषों को नहीं दिया है। एक पुरुष की शादी केवल अविवाहित महिलाओं तक ही सीमित है। जबकि एक महिला अविवाहित या विवाहित पुरुष से शादी कर सकती है। यह बच्चों के वास्तविक पिता के वंश को सुनिश्चित रखने और बच्चों के अधिकारों और उनके पिता से वरासत की रक्षा के लिए है। इस्लाम एक महिला को एक विवाहित पुरुष से शादी करने की अनुमति देता है, जब तक कि उसकी चार से कम पत्नियाँ हों, अगर न्याय और क्षमता की शर्त पूरी होती हो। इसलिए महिलाओं के पास पुरुषों में से चुनने के लिए अधिक विकल्प हैं। इसी प्रकार उसके पास दूसरी पत्नी के साथ होने वाले व्यवहार को जानने का अवसर भी है, ताकि वह शादी करने से पहले इस पति के चरित्र को अच्छी तरह जान सके।
भले ही हम विज्ञान के विकास के साथ डीएनए की जांच कर बच्चों के अधिकार के संरक्षण की संभावना को स्वीकार करें, परन्तु बच्चों का क्या दोष है कि जब वे बाहर संसार में आएं और अपनी माँ को अपने पिता से इस परीक्षा के माध्यम से मिलाते हुए पाएं? अगर ऐसा होता है, तो उनकी मनोदशा क्या होगी? फिर एक महिला इस अस्थिर मिजाज के साथ, जो उसके पास है, चार पुरुषों की पत्नी की भूमिका कैसे निभा सकती है? इसके अलावा एक ही समय में एक से अधिक पुरुषों के साथ उसके संबंध के कारण होने वाली बीमारियाँ अलग हैं।
मर्द का औरत पर पर्यवेक्षक बनाया जाना औरत का सम्मान एवं मर्द की ज़िम्मेदारी बढ़ाना है, क्योंकि मर्द औरत की देख-भाल तथा उसकी ज़रूरतों को पूरा करता है। मुस्लिम महिलाएँ रानी की भूमिका निभाती हैं, जिसकी आशा पृथ्वी की हर महिला करती है। होशियार महिला वह है, जो वही चुनती है, जो उसे होना चाहिए। या तो एक सम्मानित रानी या सड़क पर काम करने वाली एक कामगार।
अगर हम मान लें कि कुछ मुस्लिम पुरुष इस संरक्षण का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो यह संरक्षण प्रणाली का दोष नहीं है, बल्कि इसका दुरुपयोग करने वालों का दोष है।
इस्लाम से पहले, महिलाओं को विरासत से वंचित कर दिया गया था। जब इस्लाम आया, तो उसे विरासत में शामिल किया। औरत को पुरुषों की तुलना में अधिक या उनके बराबर हिस्सा भी मिलता है। कुछ हालतों में वह उत्तराधिकारी बन जाती है और पुरुष नहीं बन पाता। जबकि अन्य हालतों में रिश्तेदारी और वंश के दर्जे के अनुसार पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक अनुपात प्राप्त होता है। यही वह हालत है जिसके बारे में पवित्र क़ुरआन कहता है :
''अल्लाह तुम्हारी संतान के संबंध में तुम्हें आदेश देता है कि पुत्र का हिस्सा, दो पुत्रियों के बराबर है।'' [210] [सूरा अल-निसा : 11]
एक मुस्लिम महिला ने एक बार कहा कि वह इस बात को तब तक नहीं समझ पाई, जब तक कि उसके पति के पिता की मृत्यु नहीं हो गई और उसके पति को अपनी बहन की तुलना में दोगुनी राशि विरासत में मिली। उसके पति ने उन पैसों से एक कार और अपने परिवार के एक निजी घर के लिए आवश्यक चीजें खरीदीं। जबकि उसकी बहन ने मिले पैसों से गहने खरीदे और बाकी पैसों को बैंक में जमा कर दिया। क्योंकि उसके पति को ही आवास और अन्य मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करानी थीं। तब उस महिला ने इस आदेश की हिकमत को समझा और अल्लाह का शुक्र अदा किया।... More
मुहम्मद -शांति और आशीर्वाद उनपर हो- ने अपने जीवन में कभी किसी महिला को नहीं मारा। जहाँ तक क़ुरआन की उस आयत का संबंध है, जिसमें मारने के बारे में बताया गया है, तो इसका अर्थ अवज्ञा के मामले में हल्की मार है। किसी समय संयुक्त राज्य अमेरिका के मानव निर्मित क़ानून में इस प्रकार की मार की विशेषता बयान की गई है कि ऐसी मार हो जो शरीर पर कोई प्रभाव न छोड़े। दरइसल सका सहारा उससे बड़े खतरे को रोकने के लिए लिया जाता है। जैसे कि कोई अपने बेटे को गहरी नींद से जगाने पर उसके कंधे को हिलाता है, ताकि उससे परीक्षा का समय न छूट जाए।
आइए एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें, जो अपनी बेटी को खिड़की के सिरे पर खड़ा पाता है, ताकि वह स्वयं को गिरा ले। ऐसे में उसके हाथ अनैच्छिक रूप से उसकी ओर बढ़ेंगे और वह उसे पकड़ कर पीछे धकेल देगा, ताकि वह खुद को नुक़सान न पहुँचाए। यहाँ औरत को मारना उद्देश्य नहीं होता, बल्कि पति की कोशिश उसके घर और उसकी औलाद के भविष्य को बर्बाद करने से पत्नी को रोकने की होती है।
वह भी, यह मर्हला कई चरणों के बाद आता है, जैसा कि आयत में बताया गया है :... More
इस्लाम ने महिलाओं को आदम के पाप के बोझ से मुक्त करके उन्हें सम्मानित किया, जबकि अन्य धर्मों में उसे इससे मुक्त नहीं किया गया है।
इस्लाम में है कि अल्लाह ने आदम -अलैहिस्सलाम- को क्षमा कर दिया और हमें सिखाया कि यदि जीवन में कभी भी पाप हो जाए तो हम उसको कैसे क्षमा करवा सकते हैं।
''फिर आदम ने अपने पालनहार से कुछ शब्द सीख लिए, तो उसने उसकी तौबा क़बूल कर ली। निश्चय वही है जो बहुत तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान् है।'' [213] [सूरा अल बक़रा : 37]... More
व्यभिचार के अपराध के गंभीर दंड के संंबंध में यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच पूर्ण सहमति है। [223] [ओल्ड टेस्टामेंट, Book of Leviticus : 20: 10 –18]
ईसाई धर्म में, मसीह ने व्यभिचार के अर्थ पर जोर दिया है। इसे एक मूर्त तथा भौतिक कार्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक नैतिक अवधारणा में बदल दिया है। [224] ईसाई धर्म ने व्यभिचारियों को अल्लाह के राज्य का वारिस होने से वंचित क़रार दिया है, और उसके बाद उनके पास नरक में अनन्त पीड़ा के अलावा कोई विकल्प नहीं है। [225] इस जीवन में व्यभिचारियों की सज़ा वही है, जो मूसा -अलैहिस्सलाम- की शरीयत द्वारा निर्धारित की गई थी। अर्थात्, पत्थर मारकर मार डालना। [न्यू टेस्टामेंट, मत्ती का सुसमाचार 5:27-30] [न्यू टेस्टामेंट, First Epistle to the Corinthians 6:9-10] [न्यू टेस्टामेंट, Gospel of John 8:3-11]
साथ ही बाइबिल के विद्वान आज यह स्वीकार करते हैं कि मसीह के व्यभिचारिणी को क्षमा करने की कहानी, वास्तव में, जॉन की इंजील की शुरुआती प्रतियों में मौजूद नहीं है। इसे बाद में जोड़ दिया गया है और आधुनिक अनुवादों से यही साबित होता है। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मसीह -अलैहिस्सलाम- ने अपनी दावत के आरम्भ में ही यह घोषणा कर दी थी कि वह मूसा की व्यवस्था और उससे पहले के नबियों में दोष निकालने नहीं आए हैं। मूसा के क़ानून से एक बिंदु भी कम करने की तुलना में आसमान और पृथ्वी का विनाश उनके लिए आसान है, जैसा कि ल्यूक की इनजील में कहा गया है। [228] इस तरह यह संभव नहीं है कि मसीह -अलैहिस्सलाम- व्यभिचारी स्त्री को दण्डित किए बिना छोड़कर मूसा की व्यवस्था को भंग करें। /https://www.alukah.net/sharia/ 0/82804/ [न्यू टेस्टामेंट, Gospel of Luke16:17]... More
इस्लाम ने लोगों के बीच न्याय और नाप-तौल में निष्पक्षता स्थापित करने का आह्वान किया है।
"तथा मद्यन की ओर उनके भाई शुऐब को (भेजा)। उसने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। निःसंदेह तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। अतः पूरा-पूरा नाप और तौलकर दो और लोगों की चीज़ों में कमी न करो। तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ न फैलाओ। यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम ईमानवाले हो।'' [232] [सूरा अल-आराफ़ : 85]
''ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए मज़बूती से क़ायम रहने वाले, न्याय के साथ गवाही देने वाले बन जाओ। तथा किसी समूह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर हरगिज़ न उभारे कि तुम न्याय न करो। न्याय करो, यह तक़्वा (अल्लाह से डरने) के अधिक निकट है, और अल्लाह से डरो। निःसंदेह अल्लाह उससे भली-भाँति अवगत है जो तुम करते हो।'' [233] [सूरा अल-माइदा : 8]... More
"और (ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो, तथा माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि तेरे पास दोनों में से एक या दोनों वृद्धावस्था को पहुँच जाएँ, तो उन्हें 'उफ़' तक न कहो, और न उन्हें झिड़को, और उनसे नरमी से बात करो।'' और दयालुता से उनके लिए विनम्रता की बाँहें झुकाए रखो और कहो : ऐ मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन्होंने बचपन में मेरा पालन-पोषण किया।" [246] [सूरा अल-इसरा : 23-24]
''और हमने मनुष्य को अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद दी। उसकी माँ ने उसे दुःख झेलकर गर्भ में रखा तथा दुःख झेलकर जन्म दिया और उसकी गर्भावस्था की अवधि और उसके दूध छोड़ने की अवधि तीस महीने है। यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हो गया, तो उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मुझे सामर्थ्य प्रदान कर कि मैं तेरी उस अनुकंपा के लिए आभार प्रकट करूँ, जो तूने मुझपर और मेरे माता-पिता पर उपकार किए हैं। तथा यह कि मैं वह सत्कर्म करूँ, जिसे तू पसंद करता है तथा मेरे लिए मेरी संतान को सुधार दे। निःसंदेह मैंने तेरी ओर तौबा की तथा निःसंदेह मैं मुसलमानों (आज्ञाकारियों) में से हूँ।'' [247] [सूरा अल-अहक़ाफ़ :15]
''और रिश्तेदारों को उनका हक़ दो, तथा निर्धन और यात्री को (भी) और अपव्यय न करो।'' [248] [सूरा अल-इसरा : 26]... More
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है।” पूछा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह बात आप किसके बारे में कह रहे हैं? आपने उत्तर दिया : “जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से सुरक्षित नहीं रहता।” [249] [सहीह बुख़ारी तथा सहीह मुस्लिम]
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है: ''पड़ोसी को शुफ़आ का अधिकार (अर्थात वह खरीदार पर ज़ोर डालकर पड़ोसी की संपत्ति ख़रीद सकता है) है। यदि पड़ोसी ग़ायब हो तो उसकी प्रतीक्षा की जाएगी, यदि उन दोनों का रास्ता एक हो।'' [250] [मुसनद इमाम अहमद]
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''ऐ अबूज़र! जब शोरबा पकाओ, तो उसमें पानी ज़्यादा डाल दो और पड़ोसियों का भी ख़्याल रख लो।'' [251] [इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।]... More
''तथा धरती में न कोई चलने वाला है तथा न कोई उड़ने वाला, जो अपने दो पंखों से उड़ता है, परंतु तुम्हारी जैसी जातियाँ हैं। हमने पुस्तक में किसी चीज़ की कमी नहीं छोड़ी। फिर वे अपने पालनहार की ओर एकत्र किए जाएँगे।'' [253] [सूरा अल-अनआम : 38]
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''एक औरत को एक बिल्ली के कारण यातना दी गई, जिसे उसने बाँधकर रखा था, यहाँ तक कि वह मर गई। अतः वह उसके कारण जहन्नम में गई। जब उसने उसे बाँधकर रखा, तो न कुछ खाने को दिया, न पीने को दिया और न ही आज़ाद छोड़ा कि वह स्वयं धरती के कीड़े-मकोड़े खा सकती।'' [254] [सहीह बुख़ारी तथा सहीह मुस्लिम]
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "एक आदमी ने एक कुत्ते को देखा कि वह प्यास के मारे (शबनम से भीगी) ज़मीन को चाट रहा है। यह देख उस आदमी ने अपने मोज़े को उतारकर (और उसमें पानी भरकर) उस कुत्ते को पिलाया और उसकी प्यास बुझा दी। इसपर अल्लाह ने उसका धन्यवाद किया और उसको जन्नत में प्रवेश कराया।" [255] (इसे इमाम बुखारी एवं इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।)... More
''तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात् बिगाड़ न पैदा करो, और उसे भय और लोभ के साथ पुकारो। निःसंदेह अल्लाह की दया अच्छे कर्म करने वालों के क़रीब है।'' [256] [सूरा अल-आराफ़ : 56]
“जल और थल में लोगों के हाथों की कमाई के कारण बिगाड़ फैल गया है, ताकि वह (अल्लाह) उन्हें उनके कुछ कर्मों का मज़ा चखाए, ताकि वे बाज़ आ जाएँ।” [257] [सूरा अल-रूम : 41]
''तथा जब वह वापस जाता है, तो धरती में दौड़-धूप करता है ताकि उसमें उपद्रव फैलाए तथा खेती और नस्ल (पशुओं) का विनाश करे और अल्लाह उपद्रव को पसंद नहीं करता।'' [258] [सूरा अल-बक़रा : 205]... More
इस्लाम हमें सिखाता है कि सामाजिक कर्तव्य प्यार, दया और दूसरों के प्रति सम्मान पर आधारित होने चाहिएँ।
इस्लाम ने समाज को जोड़ने वाले सभी रिश्तों के आधार, मानदंड एवं नियम बनाए हैं और सभी रिश्तों के अधिकार तथा कर्तव्य तय किए हैं।
''तथा अल्लाह की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ तथा माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों, निर्धनों, नातेदार पड़ोसी, अपरिचित पड़ोसी, साथ रहने वाले साथी, यात्री और अपने दास-दासियों के साथ अच्छा व्यवहार करो। निःसंदेह अल्लाह उससे प्रेम नहीं करता, जो इतराने वाला, डींगें मारने वाला हो।'' [260] [सूरा अल-निसा : 36]... More
इस्लाम अनाथ के लालन-पालन करने की प्रेरणा देता है और अनाथ का लालन-पालन करने वाले से आग्रह करता है कि वह अनाथ के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह अपने बच्चों के साथ करता है। परन्तु अनाथ का अपने असली परिवार को जानने का अधिकार सुरक्षित रखता है, ताकि उसका अपने बाप से विरासत पाने का अधिकार सुरक्षित रहे और वंश मिश्रित न हो।
एक पश्चिमी लड़की की कहानी, जिसे तीस साल बाद अचानक पता चला कि वह एक गोद ली हुई बेटी है, तो उसने आत्महत्या कर ली। यह कहानी गोद लेने के क़ानून की ख़राबी का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि वे उसे बचपन से ही बता देते, तो यह उसपर दया करना होता और उसे अपने परिवार को ढूँढ़ने का अवसर प्राप्त होता।
''तो तुम भी अनाथ पर सख़्ती न किया करो।'' [263] [सूरा अल-ज़ुहा : 9]... More
मांस प्रोटीन का मूल स्रोत है। इसी तरह इन्सान के कुछ दाँत चिपटे और कुछ नुकीले होते हैं। ये दांत मांस चबाने और पीसने के काम आते हैं। अल्लाह ने मनुष्य को पौधों और जानवरों को खाने के लिए उपयुक्त दांत दिए हैं तथा पौधों और पशुओं से प्राप्त खाद्य पदार्थों को पचाने के लिए उपयुक्त पाचन तंत्र प्रदान किया है, जो जानवरों का खाना हलाल होने की दलील है।
''तुम्हारे लिए चौपाए जानवर (मवेशी) हलाल किए गए हैं।'' [266] [सूरा अल-माइदा : 1]
पवित्र क़ुरआन में खाद्य पदार्थों के संबंध में कुछ नियम बताए गए हैं :... More
जानवर को ज़बह करने का इस्लामी तरीक़ा, जिसमें जानवर के गले और अन्ननली को तेज चाकू से काट दिया जाता है, बिजली का झटका देकर मारने तथा दम घोंटकर मारने से अधिक दयापूर्ण तरीक़ा है। क्योंकि मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह बंद हो जाने मात्र से पशु को दर्द महसूस होना बंद हो जाता है। जानवर को ज़बह करते समय उसका उठ खड़ा होना दर्द के कारण नहीं, बल्कि रक्त के तेज प्रवाह के कारण है। जिससे जानवर का रक्त आसानी के साथ बाहर निकल जाता है। जबकि दूसरी पद्धतियों में रक्त अंदर रुका रह जाता है, जिसके कारण उसका मांस हानिकारक हो जाता है।
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''अल्लाह तआला ने हर चीज़ में अच्छे बरताव को अनिवार्य किया है। अतः, जब तुम क़त्ल करो तो अच्छे अंदाज़ में क़त्ल करो, और जब ज़बह करो तो अच्छे अंदाज़ में ज़बह करो। तुम अपनी छुरी को तेज़ कर लो और अपने ज़बीहा- ज़बह किए जाने वाले जानवर- को आराम पहुँचाओ।'' [275] [इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।]
पशु की आत्मा और मानव आत्मा के बीच एक बड़ा अंतर है। जानवर की आत्मा शरीर को हरकत देने वाली शक्ति है। जब यह मृत्यु के कारण उसके शरीर से अलग हो जाती है, तो वह एक निर्जीव लाश बन जाता है। यह भी दरअसल जीवन का एक प्रकार है। पेड़-पौधों में भी एक प्रकार का जीवन होता है, जिसे आत्मा नहीं कहा जाता है। बल्कि यह एक ऐसा जीवन है, जो पानी के माध्यम से उनके अंगों में प्रवेश करता है। फिर जब वह उससे जुदा होता है, तो वह मुरझाकर गिर जाता है।
''और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई है। क्या वे ईमान नहीं लाते?'' [276] [सूरा अल-अंबिया : 30]
लेकिन यह मानव आत्मा की तरह नहीं है, जिस मानव आत्मा को आदर और सम्मान देने के उद्देश्य से उसकी निस्बत अल्लाह की ओर की गई है। इसकी हक़ीक़त (वास्तविकता) को केवल अल्लाह ही जानता है और यह केवल मनुष्य के लिए विशिष्ट है। मानवीय आत्मा अल्लाह का एक आदेश है और मनुष्य के लिए इसके सार को समझना आवश्यक नहीं है। यह शरीर को हरकत देने वाली शक्ति के अलावा इसमें समझने की शक्ति (अक़ल), बौद्धिक शक्ति, ज्ञान और ईमान भी मौजूद है और यही चीज़ इसको जानवरों की आत्मा से अलग करती है।... More
यह अल्लाह की अपनी सृष्टि पर रहमत और दया है कि उसने हमें स्वच्छ चीज़ों को खाने का आदेश दिया है एवं बुरी चीजों के खाने से मना किया है।
''जो उस रसूल का अनुसरण करेंगे, जो उम्मी (अनपढ़) नबी हैं, जिन (के आगमन) का उल्लेख वे अपने पास तौरेत तथा इंजील में पाते हैं; जो उन्हें सदाचार का आदेश देंगे और दुराचार से रोकेंगे, उनके लिए स्वच्छ चीज़ों को हलाल (वैध) तथा मलिन चीज़ों को हराम (अवैध) करेंगे, उनसे उनके बोझ उतार देंगे तथा उन बंधनों को खोल देंगे, जिनमें वे जकड़े हुए होंगे। अतः जो लोग आप पर ईमान लाए, आपका समर्थन किया, आपकी सहायता की तथा उस प्रकाश (क़ुरआन) का अनुसरण किया, जो आपके साथ उतारा गया, तो वही सफल होंगे।'' [277] [सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या :157]
इस्लाम ग्रहण करने वाले कुछ लोगों बताया है कि उनके इस्लाम ग्रहण करने का कारण सूअर था।... More
इस्लाम में धन का उद्देश्य व्यापार, वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान, निर्माण और आबादकारी है। अतः जब हम कमाने के उद्देश्य से धन उधार देते हैं, तो हम धन को आदान-प्रदान और विकास का साधन बनाने के बजाय उसे ही साध्य बना लेते हैं।
ऋणों पर लगाया जाने वाला ब्याज या सूद उधारदाताओं के लिए एक प्रोत्साहन है, क्योंकि उनके नुक़सान की संभावना नहीं होती है। इस प्रकार उधारदाताओं द्वारा हर वर्ष अर्जित संचयी लाभ अमीर और गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा करेगा। हाल के दशकों में, सरकारों और संस्थानों को इस चीज़ में बड़े पैमाने पर फंसाया गया है, जिसके कारण हमने कुछ देशों की आर्थिक व्यवस्था के चरमराने के कई उदाहरण देखे हैं। सूदखोरी के अंदर समाज में भ्रष्टाचार फैलाने की ऐसी ताक़त है, जो किसी दूसरे अपराध में नहीं है। [282]
अल्लाह तआला ने कहा है : ईसाई सिद्धांतों के आधार पर, थॉमस एक्विनास ने सूदखोरी या ब्याज के साथ उधार लेने की निंदा की है। चर्च, अपनी महान धार्मिक और सांसारिक भूमिका के कारण, दूसरी शताब्दी से धर्म गुरुओं के बीच इसे प्रतिबंधित करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करने के बाद अपनी जनता के बीच सूदखोरी के निषेध को सामान्य बनाने में सफलता प्राप्त की। थॉमस एक्विनास के अनुसार, ब्याज पर रोक लगाने का औचित्य यह है कि ब्याज उधारकर्ता पर ऋणदाता की प्रतीक्षा की कीमत नहीं हो सकता है, अर्थात उस समय की कीमत जो उधारकर्ता लेता है, क्योंकि वे इस कार्य (उधार के लेन देन) को व्यापारिक लेन-देन के रूप में देखते हैं। अतीत में, दार्शनिक अरस्तू का मानना था कि पैसा विनिमय का एक साधन है न कि लाभ एकत्र करने का रास्ता। जहाँ तक प्लेटो की बात है, तो वह लाभ को शोषण के रूप में देखते थे, फिर भी अमीरों ने समाज के गरीब सदस्यों पर इसको आज़माया (उनसे लाभ और ब्याज लिया)। यूनानियों के समय में सूदी लेन-देन अत्यधिक प्रचलित था। यह क़र्जदाता का अधिकार था कि वह कर्जदार को गुलाम बाजार में बेच दे, अगर वह अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ हो। रोमनों के यहाँ भी स्थिति अलग नहीं थी। उल्लेखनीय है कि यह निषेध धार्मिक प्रभावों के अधीन नहीं था, क्योंकि यह ईसाई धर्म के आगमन से तीन शताब्दियों पहले हुआ था। ज्ञात रहे कि बाइबल ने अपने अनुयायियों को सूदख़ोरी का मामला करने से मना किया था और ऐसा ही तौरात ने पहले किया था।... More
अल्लाह तआला ने अक़्ल देकर मनुष्य को अन्य सभी प्राणियों से अलग किया है और हमपर उन चीज़ों को हराम किया है, जो हमारी अक़्ल या शरीर को हानि पहुँचाएँ। इसलिए उसने हमपर हर नशा लाने वाली चीज़ को वर्जित कर दिया है, क्योंकि यह बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है, उसे नुक़सान पहुँचाती है और उसे हर तरह के भ्रष्टाचार की ओर ले जाती है। शराब पीने वाला व्यक्ति हत्या कर सकता है, व्यभिचार कर सकता है, चोरी कर सकता है और इनके अलावा दूसरे बड़े अपराधों को भी अंजाम दे सकता है।
“ऐ ईमान वालो! बात यही है कि शराब तथा जुआ और थान (मूर्तियों के स्थान) तथा फ़ाल निकालने के पाँसे के तीर यह सब गंदी बातें, शैतानी काम हैं, इनसे बिल्कुल अलग रहो, ताकि तुम सफल हो जाओ।” [288] [सूरा अल-माइदा : 90]
शराब हर उस चीज़ का नाम है, जिसमें नशा हो। चाहे उसका नाम या शक्ल कुछ भी हो। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है : “हर नशा लाने वाली चीज़ शराब है और हर नशा लाने वाली चीज़ हराम है।” [289] इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।... More
सृष्टिकर्ता के एक होने की गवाही और स्वीकृति देना और उसी की इबादत करना, साथ ही यह स्वीकार करना कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसके बन्दे एवं उसके रसूल हैं।
नमाज़ के द्वारा सारे संसारों के रब के साथ संबंध साधे रखना।
रोज़ा के माध्यम से एक व्यक्ति की इच्छा और आत्म-नियंत्रण को मजबूत करना और दूसरों के साथ दया और प्रेम की भावनाओं को विकसित करना।... More
मुसलमान अपने रब के आज्ञापालन में नमाज़ पढ़ता है, जिसने उसे नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया है एवं नमाज़ को इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ बनाया है।
एक मुसलमान रोज़ सुबह पांच बजे नमाज़ के लिए खड़ा होता है और उसके गैर-मुस्लिम दोस्त ठीक उसी समय सुबह व्यायाम के लिए निकलते हैं। उसके लिए, उसकी नमाज़ शारीरिक और आध्यात्मिक पोषण है, जबकि उसके गैर-मुस्लिम दोस्तों के लिए व्यायाम केवल शारीरिक भोजन है। नमाज़ दुआ से भिन्न है, जो अल्लाह से किसी ज़रूरत के लिए की जाती है। एक मुसलमान बिना शारीरिक हरकत जैसे रुकू और सजदा आदि किए किसी भी समय दुआ कर सकता है।
ध्यान दें कि हम अपने शरीर की कितनी देखभाल करते हैं, जबकि आत्मा भूख से बिलखती है और इसका परिणाम दुनिया के सबसे समृद्ध लोगों की अनगिनत आत्महत्याएँ हैं।... More
मुसलमान पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षाओं का पालन करता है और ठीक उसी तरह नमाज़ पढ़ता है, जैसे पैगंबर ने नमाज़ पढ़ी थी।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तुम लोग उसी तरह नमाज़ पढ़ो, जिस तरह तुमने मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखा है।" [294] इसे इमाम बुख़ारी ने रिवायत किया है।
मुसलमान दिन भर अपने रब से संबंध साधने की अपनी तीव्र इच्छा के कारण दिन में पाँच बार नमाज़ के द्वारा उससे वार्तालाप करता है। यह वह साधन है, जिसे अल्लाह ने हमें उससे वार्तालाप करने के लिए प्रदान किया है और हमें अपनी भलाई के लिए इसका पालन करने का आदेश दिया है।... More
अल्लाह ने पवित्र घर काबा [297] को इबादत के लिए पहला घर और मोमिनों की एकता का प्रतीक बनाया है, जिसकी ओर सभी मुसलमान नमाज़ के समय मुँह करते हैं और इस तरह वे धरती के विभिन्न क्षेत्रों से दायरे बनाते हैं, जिनका केंद्र मक्का है। क़ुरआन हमें इबादत करने वालों के आसपास की प्रकृति की प्रतिक्रिया के कई दृश्य प्रस्तुत करता है, जैसा कि नबी दाऊद -अलैहिस्सलाम- के साथ पहाड़ों एवं परिंदों का अल्लाह की पवित्रता बयान करना एवं पवित्र किताब की तिलावत करना। ''तथा हमने प्रदान किया दाऊद को अपना कुछ अनुग्रह, हे पर्वतो! सरुचि महिमा गान करो उसके साथ तथा हे पक्षियो! तथा हमने कोमल कर दिया उसके लिए लोहा को।'' [298] इस्लाम एक से अधिक जगहों में ज़ोर देकर कहता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड, अपनी सारी सृष्टियों सहित, सारे संसार के रब की प्रशंसा और महिमा गान करता है। अल्लाह तआला ने कहा है : [सूरा सबा : 10]
''निःसंदेह पहला घर, जो मानव के लिए (अल्लाह की वंदना का केंद्र) बनाया गया, वह वही है, जो मक्का में है, जो शुभ तथा संसार वासियों के लिए मार्गदर्शन है।'' [299] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 96) काबा एक चौकोर और लगभग घनाकार इमारत है, जो मक्का अल-मुकर्रमा में मस्जिद-ए-हराम के केंद्र में स्थित है। इस भवन में एक दरवाज़ा है और कोई खिड़की नहीं है। उसमें कुछ नहीं है। न वह किसी की क़ब्र है। वह केवल नमाज़ का कमरा है। काबा के अंदर जो मुसलमान नमाज़ पढ़ता है, वह किसी तरफ़ भी मुँह करके नमाज़ पढ़ सकता है। पूरे इतिहास में काबा का कई बार नवीकरण हुआ है। पैगंबर इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- ने सबसे पहले अपने बेटे इस्माइल -अलैहिस्सलाम- के साथ मिलकर इस घर को उसकी बुनियादों से उठाने का काम किया था। काबा के एक कोने में ''हजर-ए-असवद'' अर्थात काला पत्थर लगा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि यह आदम -अलैहिस्सलाम- के समय आया था। लेकिन यह कोई चमत्कारी पत्थर नहीं है या इसमें अप्राकृतिक शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि यह मुसलमानों के लिए एक प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है।
पृथ्वी की गोलाकार प्रकृति दिन और रात को आगे-पीछे लाने का काम करती है, जबकि मुसलमानों का काबा के चारों ओर तवाफ़ में व्यस्त होना और पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों से मक्का की ओर मुँह करके दिन भर में पाँच वक़्त की नमाज़ें पढ़ना, स्थायी रूप से सारे संसार के रब की महिमा और प्रशंसा में निरंतर रूप से लगे पूरे ब्रह्मांड का हिस्सा बनता है। दरअसल सृष्टिकर्ता की ओर से अपने पैगंबर इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- को काबा की नींव उठाने और उसके चारों ओर तवाफ़ करने का आदेश था और उसने हमें आदेश दिया है कि काबा हमारी नमाज़ का क़िबला हो।... More
पूरे इतिहास में काबा का बहुत उल्लेख किया गया है। अरब प्रायद्वीप के सबसे दूरस्थ हिस्सों से भी लोग सालाना इसका भ्रमण करते और पूरे अरब प्रायद्वीप के लोग इसकी पवित्रता का सम्मान करते रहे हैं। काबा का उल्लेख ओल्ड टेस्टामेंट की भविष्यवाणियों में भी हुआ है। (बक्का की वादी में गुज़रते हुए, वहाँ झरना निकालेंगे।) [300]
अरब अपने अज्ञान काल में भी इस पवित्र घर का सम्मान करते थे। मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को नबी बनाकर भेजे जाने के समय अल्लाह ने पहले बैत अल-मक़दिस को क़िबला बनाया, फिर उसे छोड़ बैत अल-हराम (काबा) की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया, ताकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अनुयायियों में से जो लोग अल्लाह के लिए निष्ठावान हैं, उनको छाँट लिया जाए, उन लोगों से जो पलट जाने वाली प्रवृति के हों। क़िबला का रुख़ बदलने का उद्देश्य दिलों को अल्लाह के लिए शुद्ध करना एवं दूसरे के साथ संबंध को ख़त्म करना था। चुनांचे मुसलमानों ने मान लिया और वे उसी तरफ फिर गए जिस तरफ अल्लाह ने उन्हें फेरा। जबकि यहूदी पैगंबर के बैत अल-मक़दिस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने को अपने लिए एक तर्क मानते थे। [ओल्ड टैस्टमैंट, भजनसंहिता : 84]
क़िबला का परिवर्तन दरअसल एक महत्वपूर्ण मोड़ और धार्मिक नेतृत्व को बनी इसराईल से लेकर अरबों को हस्तांतरित करने का संकेत था। यह संसार के रब के साथ किए गए उनके वचनों को भंग करने के कारण हुआ।... More
बुतपरस्त धर्मों और कुछ निर्धारित स्थानों तथा प्रतीकों का सम्मान करने के बीच एक बड़ा अंतर है, चाहे वो धार्मिक हों या राष्ट्रीय या सामुदायिक।
उदाहरण स्वरूप, जमरात को पत्थर मारना, कुछ विचारों के अनुसार, केवल हमारा शैतान का विरोध करने, उसका अनुपालन न करने और इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- के काम की पैरवी करने के लिए है, जब उनके सामने शैतान उन्हें अल्लाह के आदेश को लागू करने एवं अपने बेटे को क़ुरबान करने से रोकने के लिए प्रकट हुआ और उन्होंने उसे पत्थर मारा। [301] इसी तरह सफा और मरवा के बीच दौड़ लगाना, हाजरा -अलैहस्सलाम- के काम का अनुसरण करने के लिए है, जब उन्होंने अपने बेटे इस्माइल -अलैहिस्सलाम- के लिए पानी की तलाश में दौड़ लगाई थी। बहरहाल, हज के सभी काम अल्लाह के ज़िक्र को स्थापित करने के लिए एवं सारे संसार के रब की आज्ञाकारिता और उसके आगे समर्पण के प्रमाण के तौर पर हैं। इनसे पत्थर या किसी स्थान या व्यक्तियों की इबादत उद्देश्य नहीं है। जबकि, इस्लाम एक अल्लाह की इबादत का आह्वान करता है, जो आकाशों और धरती और उनके बीच मौजूद सारी चीज़ों का स्वामी है, हर चीज का सृष्टिकर्ता और मालिक है। इमाम हाकिम ने ''मुस्तदरक'' और इमाम इब-ए-ख़ुज़ैमा ने अपनी सहीह में इब्न-ए-अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हूमा- से रिवायत किया है।
उदाहरण के लिए, क्या हम किसी को अपने पिता के पत्र वाले लिफाफे को चूमने के लिए दोषी ठहराते हैं? हज के सभी काम अल्लाह के ज़िक्र को स्थापित करने के लिए एवं सारे संसार के रब की आज्ञाकारिता और उसके आगे समर्पण के प्रमाण के तौर पर हैं। इनसे पत्थर या किसी स्थान या व्यक्तियों की इबादत उद्देश्य नहीं है। जबकि, इस्लाम एक अल्लाह की इबादत का आह्वान करता है, जो आकाशों और धरती और उनके बीच जो कुछ है, सबका स्वामी है, हर चीज का सृष्टिकर्ता और हर वस्तु का मालिक है।
''मैंने तो अपना मुख एकाग्र होकर, उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों तथा धरती की रचना की है और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूँ।'' [302] [सूरा अल-अनआम : 80]
हज के दौरान भीड़ से मौत चंद सालों को छोड़कर नहीं हुई है। आम तौर पर भीड़ से मरने वालों की संख्या भी बहुत कम होती है। लेकिन उदाहरण स्वरूप, शराब पीने के कारण मरने वालों की संख्या लाखों में होती है। दक्षिण अमेरिका में फुटबॉल स्टेडियम रैलियों और कार्निवाल में शिकार होने वाले उससे भी अधिक हैं। वैसे भी मौत सत्य है, अल्लाह से मिलना सत्य है और अल्लाह की आज्ञाकारिता में मृत्यु अवज्ञा की मृत्यु से बेहतर है।
मैल्कम एक्स कहते हैं :
''इस धरती पर मेरे गुज़ारे हुए उनतीस वर्षों में पहली बार, जब मैं सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के सामने खड़ा हुआ तो अनुभव किया कि मैं संपूर्ण इंसान हूँ। मैंने अपने जीवन में कभी भी सभी रंगों और नस्लों के लोगों के बीच ऐसा भाईचारा नहीं देखा है। अमेरिका को इस्लाम को समझने की जरूरत है, क्योंकि यही एकमात्र धर्म है, जिसके पास नस्लवाद की समस्या का हल है।'' एक अफ्रीकी-अमेरिकी इस्लामी उपदेशक और मानवाधिकार अधिवक्ता ने अमेरिका में इस्लामी आन्दोलन के कारवाँ को, उसके इस्लामी अक़ीदे से दृढ़ता से विचलित होने के बाद ठीक किया और सही अक़ीदा का आह्वान किया।... More
क़ुरआन में ऐसी बहुत-सी आयतें हैं, जो बन्दों के लिए अल्लाह की दया और प्रेम का उल्लेख करती हैं। परन्तु बन्दा के लिए अल्लाह की मुहब्बत बन्दों के एक-दूसरे से प्रम की तरह नहीं है। क्योंकि मानवीय मानकों में प्रेम एक ऐसी आवश्यकता है, जिसे प्रेमी तलाश करता है और उसे प्रियतम के पास पा लेता है। जबकि महान अल्लाह हम से बेनियाज़ है, हमारे लिए उसकी मुहब्बत दया और कृपा की मुहब्बत है, ताक़तवर का कमज़ोर के साथ मुहब्बत है, मालदार का फ़क़ीर के साथ मुहब्बत है, सक्षम का असहाय के लिए प्रेम है, बड़े का छोटे के साथ प्रेम है और हिकमत का प्रेम है।
क्या हम अपने प्यार के बहाने अपने बच्चों को वह सब करने देते हैं, जो उन्हें पसंद है? क्या हम अपने प्यार के बहाने अपने छोटे बच्चों को घर की खिड़की से बाहर कूदने या बिजली के नंगे तार से खेलने की अनुमति देते हैं?
यह असंभव है कि किसी व्यक्ति के निर्णय उसके व्यक्तिगत लाभ और आनंद पर आधारित हों और वह ध्यान का मुख्य केंद्र हो। उसके व्यक्तिगत हित देश के हितों एवं धर्म व समाज के प्रभावों से ऊपर हो, उसे अपना लिंग बदलने की अनुमति हो, वह जो चाहे करे, जो चाहे पहने एवं रास्ते में जैसा चाहे करे, इस तर्क की बुनियाद पर कि रास्ता सभी का है।... More
"जब उसने अपनी जाति से कहा : क्या तुम ऐसी निर्लज्जता का काम कर रहे हो, जो तुमसे पहले संसारवासियों में से किसी ने नहीं किया है? तुम स्त्रियों को छोड़कर कामवासना की पूर्ति के लिए पुरुषों के पास जाते हो? बल्कि तुम सीमा लांघने वाली जाति हो। और उसकी जाति का उत्तर बस यह था कि इनको अपनी बस्ती से निकाल दो। ये लोग अपने में बड़े पवित्र बन रहे हैं।" [305] [सूरा अल-आराफ़ : 80-82]
यह आयत पुष्टि करती है कि समलैंगिक वंशानुगत नहीं है और न यह मानव आनुवंशिक कोड की संरचना का हिस्सा है। क्योंकि लूत की जाति इस तरह की अश्लीलता का आविष्कार करने वाला समुदाय है। यह व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुरूप है, जिससे इसकी पुष्टि होती है कि समलैंगिकता का आनुवंशिकी से कोई लेना-देना नहीं है। [306] ''मौसूअह अल-कहील लिल ईजाज़ फी अल-क़ुरआन व अल-सुन्नह'', https://kaheel7.net/?p=15851
क्या हम चोर की चोरी करने की प्रवृत्ति को स्वीकार करेंगे और उसका सम्मान करेंगे? यह भी प्रवृत्ति है, लेकिन दोनों ही मामलों में यह अप्राकृतिक प्रवृत्ति है। यह मानव प्रवृत्ति के विरूद्ध बग़ावत है और प्रकृति पर हमला है। इसे ठीक किया जाना चाहिए।... More
अल्लाह उन लोगों के लिए क्षमाशील और दयालु है, जो बिना किसी जिद के और मानव स्वभाव और मनुष्य की कमज़ोरी के कारण पाप करते हैं, फिर उसके सामने तौबा करते हैं और अपने गुनाहों द्वारा अल्लाह को चुनौती नहीं देते हैं। मगर अल्लाह उसके लिए कठोर है, जो उसको चुनौती देता है, उसके अस्तित्व का इंकार करता है और उसके बुत एवं जानवर की सूरत में प्रकट होने की आस्था रखता है। इसी तरह, अल्लाह उसके लिए भी कठोर है जो अपनी अवज्ञा में आगे बढ़ता जाता है, पश्चाताप नहीं करता है और अल्लाह नहीं चाहता है कि उसे पश्चाताप की तौफ़ीक मिले। यदि कोई इंसान किसी जानवर को गाली दे, तो कोई उसे बुरा नही कहेगा, परन्तु यदि वह अपने माँ-बाप को गाली दे, तो लोग उसे सख़्त बुरा-भला कहेंगे। अब ज़रा सृष्टिकर्ता के अधिकार का अंदाज़ा लगाइए? हमें यह नहीं देखना चाहिए कि हमने कितनी छोटी अवज्ञा की है, बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि हमने किसकी अवज्ञा की है।
बुराई अल्लाह की तरफ से नहीं आती है। बुराइयाँ अस्तित्वगत मामले नहीं हैं। अस्तित्व केवल अच्छाई का है।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति खड़ा होता है और किसी अन्य व्यक्ति को तब तक मारता है, जब तक वह हिलने-डुलने की क्षमता खो नहीं देता, तो यह अत्याचार है और अत्याचार बुरी चीज़ है।
लेकिन वह व्यक्ति जो लाठी उठाता है और दूसरे व्यक्ति को मारता है, उसके पास शक्ति का होना कोई बुराई नहीं है।... More
सृष्टिकर्ता ने प्रकृति के नियम और उन्हें संचालित करने वाली पद्धतियाँ स्थापित कर रखी हैं। ये नियम और पद्धतियाँ किसी पर्यावरणीय असंतुलन या खराबी की स्थिति में खुद को खुद के द्वारा बचाने का काम करती हैं और पृथ्वी में सुधार और जीवन को बेहतर तरीके से जारी रखने के उद्देश्य से इस संतुलन के अस्तित्व को बनाए रखती हैं। दरअसल वही चीज़ पृथ्वी पर ठहरती और बाक़ी रहती है, जो लोगों और जीवन के लिए लाभकारी होती है। जब पृथ्वी पर मनुष्यों को प्रभावित करने वाली आपदाएँ, जैसे बीमारियाँ, ज्वालामुखी, भूकंप और बाढ़ आदि आती हैं, तो उनके माध्यम से अल्लाह के कुछ नाम और गुण, जैसे शक्तिशाली, शिफ़ा देने वाला और रक्षक आदि प्रकट होते हैं। उसका नाम न्याय करने वाला किसी अत्याचारी या पापी को सज़ा देते समय प्रकट होता है और उसका नाम हकीम निष्पाप व्यक्ति को आज़माते समय प्रकट होता है, जिसे आज़माइश के समय सब्र करने पर अच्छा बदला मिलेगा तथा सब्र न करने पर यातना का सामना करना पड़ेगा। इन आज़माइशों के माध्यम से इंसान अपने रब की महानता को एवं उसके दिए हुए उपहारों के माध्यम से उसके जमाल (सौंदर्य) को जान पाता है। यदि इंसान केवल अल्लाह के ख़ूबसूरत नामों एवं गुणों को जाने तो वह अल्लाह को पूरी तरह जान नहीं पाएगा।
बहुत सारे समकालीन भौतिकवादी दार्शनिकों के नास्तिक्ता अपनाने के पीछे आपदाओं, बुराई और कष्ट का हाथ रहा है। उन्हीं में से एक दार्शनिक ''एंथोनी फ्लेव'' हैं। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले अल्लाह के अस्तित्व को स्वीकार किया एवं एक पुस्तक लिखी जिसका नाम ''अल्लाह पाया जाता है'' रखा। बावजूद इसके कि वह बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नास्तिकता के नेता थे, उन्होंने अल्लाह के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए कहा :
''मानव जीवन में बुराई और पीड़ा की उपस्थिति माबूद के अस्तित्व को नकारती नहीं है, लेकिन यह हमें दैवीय गुणों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।" एंथनी फ्लेव का मानना है कि इन आपदाओं के कई सकारात्मक पहलू हैं। मसलन यह इन्सान की भौतिक क्षमताओं को उकसाती हैं और वह कुछ ऐसा आविष्कार करता है, जो उसे सुरक्षा प्रदान करता है। यह उसके सर्वोत्तम मनोवैज्ञानिक लक्षणों को भी उभारती हैं और उसे लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करती हैं। पूरे इतिहास में मानव सभ्यताओं के निर्माण में बुराई और कष्ट का भी योगदान रहा है। वह कहते हैं : "इस दुविधा की व्याख्या करने के लिए चाहे कितने भी शोध हों, धार्मिक व्याख्या सबसे स्वीकार्य और जीवन की प्रकृति के सबसे अधिक अनुकूल रहेगी।” [308] पुस्तक ''ख़ुराफ़ह अल-इल्हाद'' (नास्तिक्ता का मिथक) से उद्धरित, डा० अम्र शरीफ़, प्रकाशन वर्ष 2014 ई०।... More
अल्लाह के अस्तित्व को नकारने के बहाने के रूप में इस सांसारिक जीवन में बुराई के अस्तित्व के कारण के बारे में प्रश्न करने वाला, हमारे सामने अपनी अदूरदर्शिता, उसके पीछे की हिकमत के संबंध में अपने विचार की कमज़ोरी और अंतरतम चीजों के बारे में जागरूकता की कमी को प्रकट करता है। जबकि नास्तिकों ने भी अपने प्रश्न के ज़िम्न में यह स्वीकार किया है कि बुराई एक अपवाद है।
इसलिए, बुराई के पीछे छुपी हिकमत के बारे में पूछने से पहले, इससे भी अधिक यथार्थ प्रश्न पूछना चाहिए था कि "सबसे पहले भलाई कैसे पाई गई?''
इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है कि जो प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है, उससे शुरूआत करनी चाहिए कि भलाई को किसने पैदा किया है? हमें शुरुआती बिंदु या मूल या प्रचलित सिद्धांत पर सहमत होना चाहिए। उसके बाद हम अपवादों के कारण ढूंढ़ सकते हैं।... More
उदाहरण के तौर पर जो व्यक्ति अपने माता-पिता का तिरस्कार करता है, उनका अपमान करता है, उन्हें घर से बाहर निकाल देता है और उन्हें सड़क पर डाल देता है, हम उस व्यक्ति के बारे में क्या महसूस करेंगे?
यदि कोई व्यक्ति कहे कि वह उसको अपने घर में ले आएगा, उसका सम्मान करेगा, उसे खाना खिलाएगा और इस काम के लिए उसका धन्यवाद देगा, तो क्या लोग इस काम के लिए उसकी सराहना करेंगे? क्या लोग उसके इस व्यवहार को स्वीकार करेंगे? ऐसे में हम उस व्यक्ति के अंजाम की क्या उम्मीद कर सकते हैं, जो अपने सृष्टिकर्ता को अस्वीकार करता है और उसमें विश्वास नहीं रखता है? दरअसल उसको आग की सज़ा देना उसको सही स्थान पर रखना है। क्योंकि उसने पृथ्वी पर शांति और अच्छाई का तिरस्कार किया है, अतः वह स्वर्ग के आनंद के योग्य नहीं है।
हम उस व्यक्ति के साथ क्या व्यवहार किए जाने की उम्मीद करेंगे, जो रासायनिक हथियार से बच्चों को सज़ा दैता है। क्या उसे जन्नत में बिना हिसाब प्रवेश मिल जाएगा?... More
वास्तव में, अल्लाह चाहता है कि उसके सभी बंदे ईमान ले आएँ।
''और वह अपने बंदों के लिए नाशुक्री पसंद नहीं करता, और यदि तुम शुक्रिया अदा करो, तो वह उसे तुम्हारे लिए पसंद करेगा। और कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हारा लौटना तुम्हारे पालनहार ही की ओर है। तो वह तुम्हें बतलाएगा जो कुछ तुम किया करते थे। निश्चय वह दिलों के भेदों को भली-भाँति जानने वाला है।'' [312] [सूरा अल-जुमर : 7]
इसके बावजूद, यदि अल्लाह सभी बंदों को बिना हिसाब जन्नत में प्रवेश दे दे तो यह न्याय का घोर उल्लंघन होगा। इसका अर्थ यह होगा कि अल्लाह अपने नबी मूसा और फिरऔन के साथ एक जैसा मामला करे, और अत्याचारी एवं उनके शिकार को जन्नत में प्रवेश करा दे, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्वर्ग में प्रवेश करने वाले लोग योग्यता के आधार पर इसमें प्रवेश करें, एक तंत्र की आवश्यकता है।... More
कई अपराधों में उम्रकैद की सजा होती है। क्या कोई है जो कहता है कि उम्रकैद की सजा अनुचित है, क्योंकि अपराधी ने कुछ ही मिनटों में अपना अपराध किया? क्या दस साल की सजा अन्यायपूर्ण है, क्योंकि अपराधी ने केवल एक वर्ष के लिए धन का गबन किया है? दंड अपराधों की अवधि से संबंधित नहीं होते हैं, बल्कि अपराधों के आकार और उनकी गंभीरता से संबंधित होते हैं।
माँ अपने बच्चों को यात्रा या काम पर जाते समय आते-जाते अपना ध्यान रखने की चेतावनी देकर बहुत थका देती है, तो क्या वह एक क्रूर माँ मानी जाती है? यह मामला को उलटा पेश करने का मामला है, जो दया को क्रूरता में बदल देता है। अल्लाह अपने बंदों को सचेत करता है, उनके प्रति अपनी दया के कारण उन्हें चेतावनी देता है और उन्हें मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है। जब वे उसके सामने पश्चाताप करते हैं, तो उसने उन्हें उनके बुरे कामों को अच्छे कामों से बदलने का वादा किया है।
“उन लोगों के सिवाय जो माफी माँग लें और ईमान लाएँ और नेक काम करें। ऐसे लोगों के गुनाहों को अल्लाह नेकी में बदल देता है। अल्लाह तआला बड़ा क्षमा करने वाला और दया करने वाला है।" [314] [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 70]
दूसरी तरफ़ नेकी के थोड़-थोड़े कार्यों के बदले में अनंत काल की जन्नतों के इनाम और बड़े आनंद के वादे की ओर हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता?... More
अल्लाह तआला ने अपने सभी बन्दों को मुक्ति का मार्ग दिखाया है और वह उनके लिए अविश्वास को पसंद नहीं करता है। साथ ही वह ग़लत व्यवहार को पसंद नहीं करता है, जो इंसान कुफ़्र एवं धरती पर बिगाड़ के द्वारा करता है।
''यदि तुम नाशुक्री करो, तो अल्लाह तुमसे बहुत बेनियाज़ है और वह अपने बंदों के लिए नाशुक्री पसंद नहीं करता, और यदि तुम शुक्रिया अदा करो, तो वह उसे तुम्हारे लिए पसंद करेगा। और कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हारा लौटना तुम्हारे पालनहार ही की ओर है। तो वह तुम्हें बतलाएगा जो कुछ तुम किया करते थे। निश्चय वह दिलों के भेदों को भली-भाँति जानने वाला है।'' [316] [सूरा अल-जुमर : 7]
एक ऐसे पिता के बारे में हमारी क्या राय होगी, जो अपने बच्चों के सामने बार-बार कहता है कि मुझे तुम सब पर गर्व है, चाहे तुम लोग चोरी करो, व्याभिचार करो, हत्या करो, धरती पर फ़साद मचाओ, तुम लोग मेरे लिए नेक बन्दे की तरह हो? सीधे शब्दों में कहें तो इस पिता का सबसे सरल विशेषण यह होगा कि वह शैतान की तरह है, जो अपने बच्चों से धरती पर बिगाड़ फैलाने का आग्रह करता है।... More
हमें ईमान एवं सारे संसारों के रब के प्रति समर्पण के बीच अंतर करना होगा।
सारे संसारों के रब का आवश्यक अधिकार, जिसे छोड़ना किसी के लिए उचित नहीं है, यह है कि उसके एक होने को स्वीकार किया जाए, उसी की इबादत की जाए, उसके साथ किसी को साझी न ठहराया जाए। वही एक सृष्टिकर्ता है, उसी की बादशाहत है, उसी का आदेश चलता है, चाहे हम मानें या इंकार कर दें। यही ईमान का मूल है (ईमान स्वीकार करने एवं काम करने का नाम है)। इसके अतिरिक्त हमारे पास दूसरा विकल्प नहीं है। इसी की रोशनी में इंसान का हिसाब होगा एवं उसे सज़ा दी जाएगी।
समर्पण का उलटा अपराध है।... More
इस ब्रह्मांड के चारों ओर तलाश करना एवं ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है। अल्लाह ने हमें यह बुद्धि इसलिए दी है, ताकि हम इसका प्रयोग करें, न कि इसे बेकार छोड़ दें। जो भी व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग किए बिना या अपने पितरों के धर्म का विश्लेषण किए बिना उसका पालन करता है, वह अपने आपपर अत्याचार करता है, खुद अपना तिरस्कार करता है और अल्लाह की दी हुई अक़्ल जैसी एक बहुत बड़ी नेमत का तिरस्कार करता है।
कितने मुसलमान एक एकेश्वरवादी परिवार में पैदा हुए फिर अल्लाह के साथ शिर्क कर सत्य मार्ग से भटक गए। वहीं बहुत सारे लोग ऐस हैं, जो बहुदेववाद या ट्रीनिटी में विश्वास रखने वाले ईसाई धर्म में पैदा हुए और फिर उन्होंने अल्लाह के एकमात्र पूज्य होने की गवाही दे दी।
निम्नलिखित प्रतीकात्मक कहानी इसी बात की व्याख्या करती है। एक पत्नी ने अपने पति के लिए मछली पकाई, परन्तु उसने उसे पकाने से पहले उसका सर एवं पूंछ काट दी। जब उसके पति ने उससे पूछा कि तुमने सर और पूंछ को क्यों काट दिया? तो उसने कहा कि मेरी माँ इसे इसी तरह पकाती है। पति ने माँ से पूछा कि जब आप मछली पकाती हैं तो पूंछ और सर क्यों काट देती हैं? माँ ने जवाब दिया कि मेरी माँ इसे ऐसे ही पकाती हैं। तब पति ने दादी से पूछा कि आप सर और पूंछ क्यों काटती हैं? उन्होंने जवाब दिया कि घर में खाना पकाने का बर्तन छोटा था और मछली को बर्तन में फिट करने के लिए मुझे सिर और पूंछ काटनी पड़ती थी।... More
इन लोगों पर महान अल्लाह अत्याचार नहीं करेगा, मगर क़यामत के दिन उनकी परीक्षा लेगा?
जिन लोगों को इस्लाम को ठीक से देखने का अवसर नहीं मिला है, उनके पास कोई बहाना नहीं है। क्योंकि, जैसा कि हमने बताया, उन्हें खोजने और सोचने में कमी नहीं करनी चाहिए। यद्यपि तर्क की स्थापना के संबंध में निश्चित होना कठिन है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से भिन्न होता है (इस मामले में कि उसपर तर्क स्थापित हुआ या नहीं)। अज्ञानता के उज्र या तर्क न पहुँचने के उज्र (excuse) का फैसला आख़िरत में अल्लाह तआला करेगा। जहाँ तक दुनिया की बात है, तो यहाँ जो सामने नज़र आए, उसके अनुसार व्यवहार किया जाएगा।
इन सब तर्कों के बाद जो अल्लाह ने लोगों पर क़ायम किए, यदि अल्लाह ने उनपर दण्ड की आज्ञा दे दी, तो यह अन्याय नहीं होगा। तर्क का मलतब है अक़्ल, स्वाभाविक प्रवृत्ति और वो संदेश एवं निशानियाँ जो ब्रह्मांड एवं स्वयं इन्सान के अंदर मौजूद हैं। इन सब के बदले में उन्हें कम से कम यह करना चाहिए कि वे अल्लाह तआला को जानें और उसे एक मानें और कम से कम इस्लाम के स्तंभों के प्रति प्रतिबद्ध रहें। यदि उन्होंने ऐसा किया तो सदैव के जहन्नम से नजात पा लेंगे एवं दुनिया व आख़िरत में ख़ुशी पाएंगे। क्या आप समझते हैं कि यह मुश्किल है?... More
इन आयतों में जीवन की यात्रा के अंत और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का सार बताया गया है।
''तथा धरती अपने पालनहार की ज्योति से जगमगाने लगेगी, और कर्मलेख (खोलकर लोगों के आगे) रख दिए जाएँगे, तथा नबियों और साक्षियों को लाया जाएगा, और उनके बीच सत्य के साथ निर्णय कर दिया जाएगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा। तथा प्रत्येक प्राणी को उसके कर्म का पूरा-पूरा फल दिया जाएगा। तथा वह भली-भाँति जानता है उसे, जो वे करते हैं। तथा जो लोग काफ़िर होंगे, वे जहन्नम की ओर गिरोह के गिरोह हाँके जाएँगे। यहाँ तक कि जब वे उसके पास आएँगे, तो उसके द्वार खोल दिए जाएँगे तथा उसके रक्षक उनसे कहेंगेः "क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो तुम्हें तुम्हारे पालनहार की आयतें सुनाते रहे तथा तुम्हें अपने इस दिन का सामना करने से सचेत करते रहे?" वे कहेंगेः "क्यों नहीं? परन्तु, काफ़िरों पर यातना की बात सिद्ध हो चुकी है। नसे कहा जाएगाः जहन्नम के द्वारों में प्रवेश कर जाओ। उसमें सदावासी रहोगे। अतः क्या ही बुरा है अभिमानियों का ठिकाना! तथा जो लोग अपने पालनहार से डरते रहे, वे जन्नत की ओर गिरोह के गिरोह ले जाए जाएँगे। यहाँ तक कि जब वे उसके पास पहुँच जाएँगे तथा उसके द्वार खोल दिए जाएँगे और उसके रक्षक उनसे कहेंगेः सलाम है तुमपर। तुम पवित्र हो। सो तुम इसमें हमेशा रहने को प्रवेश कर जाओ। तथा वे कहेंगे : सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे किया हुआ अपना वचन सच कर दिखाया, तथा हमें इस धरती का उत्तराधिकारी बना दिया। हम स्वर्ग के अंदर जहाँ चाहें, रहें। क्या ही अच्छा बदला है कर्म करने वालों का।" [331] [सूरा अल-ज़ुमर : 69-74]
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है।... More